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श्रावस्ती पर्यटन – जहां बौद्ध कथाएं जी उठती हैं

उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती गौतम बुद्ध के समय के भारत में छह सबसे बड़े शहरों में से एक था।शहर का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में मिलता है तथा मान्यता है कि पौराणिक राजा श्रावस्त के नाम पर इसका नाम रखा गया है। हालांकि, बौद्ध कथाओं के अनुसार इसका नाम यहाँ रहने वाले ऋषि सावथ के नाम पर पड़ा।

श्रावस्ती तस्वीरें, जेतवन मठ -  गंधा कुटी 
Image source: commons.wikimedia.org
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श्रावस्ती तथा आसपास के पर्यटक स्थल

श्रावस्ती बौद्धों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है और यह न केवल भारत से बल्कि श्रीलंका, जापान, चीन, थाईलैंड सहित बौद्ध दुनिया के अन्य भागों से भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यहां स्थित जेतवन मठ में बुद्ध ने अपने श्रावस्ती प्रवास के दौरान अधिकतम साल बिताए थे। शहर में उन्होनें अपनी पहली यात्रा अनाथपिंडक के आमंत्रण पर की थी जिससे उनकी मुलाकात राजग्रह में हुई थी। राप्ती नदी के पीछे स्थित इसको अनाथपिंडक के द्वारा निर्मित माना जाता है। मठ चारों ओर से कई फाटकों और चार उच्च बुर्ज समेत एक ईंट की दीवार व एक ऊंची मिट्टी की दीवार से घिरा हुआ है।

इस क्षेत्र में की गई खुदाई में साहित में कई खंडहरों का पता चला है जिनमें कई स्तूप, मठ और मंदिरों सहित कई स्तम्भ एवं बौद्ध संरचनाओं के आधार शामिल हैं। क्षेत्र में बलरामपुर जिला एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है जो अपने समृद्ध साहित्यिक परिदृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यहां की यात्रा के दौरान आप इस क्षेत्र के सबसे सुंदर गांवों में से एक पयागपुर तथा खड़गपुर भी घूम सकते हैं।

इतिहास

राप्ती नदी के तट पर स्थित श्रावस्ती कोशल राज्य की राजधानी थी तथा यहां पर बुद्ध के एक शिष्य राजा पसेन्डी का शासन था। यह माना जाता है कि उस ज्ञानी व्यक्ति नें यहाँ अपना ज्यादातर मठीय जीवन यहीं गुजारा। यहां कई मठ जेतवन समेत पुबरामा और राजकरमा के मठ पसेन्डी द्वारा बनवाये गये।

आज सावती की दीवारें अभी भी तीन प्राचीन इमारतों के अवशेषों: अनाथपिंडका के स्तूप, अंगुलिमाल के स्तूप, और और एक जैन तीर्थंकर को समर्पित एक प्राचीन मंदिर से घिरी खड़ी हैं।शहर के द्वार के बाहर, एक अन्य स्तूप ट्विन मिरेकल है।

ऐसा माना जाता है कि बुद्ध में यहां बितायी 25 वर्षा ऋतुओं में से 19 जेतवन मठ में व शेष 6 पुब्बारामा मठ में बिताई थीं। यही वह स्थान है जहां उन्होनें सबसे ज्यादा प्रवचन व उपदेश दिये थे।  श्रावस्ती का जैन समुदाय के लिए बहुत महत्व है, और यह माना जाता है कि तीसरे जैन तीर्थंकर सम्भवनाथ का जन्म यहीँ हुआ था।

श्रावस्ती का मौसम

उत्तर भारत के अन्य शहरों की भांति ही, श्रावस्ती की यात्रा के लिए आदर्श समय नवम्बर से अप्रैल तक रहता है जब मौसम सुखद व हल्का होता है। हालांकि, श्रावस्ती बौद्धों और जैनियों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है और वर्ष भर आगंतुक यहां आते रहते हैं।

श्रावस्ती कैसे पहुंचे

नजदीकी शहरों से सड़क और रेल द्वारा श्रावस्ती पहुंचा जा सकता है।निकटतम हवाई अड्डा लखनऊ हवाई अड्डा है।

 

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