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प्राचीन गोवा पर्यटन  -  यहां है बहुत कुछ

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राजधानी पणजी से उत्तर दिशा की ओर 10कि.मी. तक प्राचीन गोवा स्थित है।ऐतिहासिक तथा वास्तुकला में समृद्ध यह जगह पुर्तगाली शासन के दौरान गोवा की राजधानी हुआ करती थी। स्थानीय रूप से वेल्हा गोवा के नाम से जाना जाने वाला प्राचीन गोवा पुर्तगालियों के कब्जे से पहले 15वी. शताब्दी में बीजापुर प्रशासन द्वारा बनवाया गया था।

प्राचीन गोवा में आज ज़्यादा लोग नहीं रहते। हमेशा से ही ऐसा नहीं था, एक समय यह गोवा की सबसे अधिक जनसंख्या वाली जगह थी लेकिन 17वी. शताब्दी के दौरान बीमारी व महामारियों ने लोगो को यहाँ से जाने के लिए मजबूर कर दिया था। तब से इस जगह को वेल्हा गोवा कहा जाने लगा जिसे आज सब पणजी के नोवा गोवा के नाम से जानते हैं।

यदि यहाँ ऐसा कुछ है जो प्राचीन गोवा के गौरव को दर्शाता है, तो वह है, यहाँ बने चर्च। गोवा में असीसी के सेंट फ्रांसिस चर्च, पुर्तगालियों के समय का चर्च है जो 17वी.शताब्दी में स्थानीय सकों द्वारा बनवाया गया था। तथा इसके आंगन के बीचोंबीच सेंट माइकल की मूर्ति स्थापित है। यहाँ सुषोभित स्तंभों से लेकर सेंट पीटर व सेंट पॉल की मूर्तियों तक, हर चीज़ भव्य है और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय स्थानों जैसे सेंट पीअर्सबर्ग में भी पाई जाती है। इसमें ज़रा भी शक नहीं है कि वेल्हा गोवा में धार्मिक मूल्य बहुतायत में हैं।

जो लोग गोवा में छुट्टियाँ मनाने के लिए धार्मिक नज़रिए को प्राथमिकता नहीं देते, उन्हें निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि गोवा में रोमांचकारी गतिविधियों का भी भंडार है। शुरुआत करते हैं कृत्रिम कैरेमबोलिम ढील के साथ जो कि हज़ारों प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित स्वर्ग के रूप् में उभरकर सामने आ रहा है। पक्षियों की जितनी प्रजातियाँ हैं, उतने ही रंग भी हैं तथा इनमें से कुछ पक्षी यहाँ सदियों से आ रहे हैं। कैरेमबोलिम ढील करमाली रेलवे स्टेशन के बहुत पास है।

16वी. शताब्दी में गोवा के पुर्तगाली शासकों ने अपने प्रचारकों को काम पर लगा दिया और उसके परिणामस्वरूप जो कुछ हुआ उसे गोवा का क्रिष्चियनाइज़ेषन (ईसाई धर्म में परिवर्तन) कहा गया। उस समय के दिवार द्वीप में हिंदुओं के अनेक प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं जहाँ तीर्थयात्री आना पसंद करते थे। दुर्भागयवश, मंदिरों के कारण ईसाई धर्म नहीं रह पाया किंतु दिवार द्वीप आज भी अपने फैले हुए धान के ,खेतों के साथ बहुत सुंदर जगह है। नौका के ज़रिए दिवार द्वीप पणजी से जुड़ा है। पर्यटकों को कोशिश करनी चाहिए किड्स द्वीप पर बोंदेरम अथवा पोटेकर त्योहार के दौरान आए, चूंकि दोनो त्योहार अपने संगीत, परेड और रंगबिरंगे परिधानों के लिए प्रसिद्ध हैं।

क्या आप प्रकृति के नज़ारों और चर्च के अलावा वास्तुकला के अद्भुत नमूने देखना चाहते हैं? तो, वाइसराय के मेहराब की ओर बढि़ए जो कि 16वी. शताब्दी में वास्को दा गामा के अन्वेषक की उपलब्धियों की स्मृति में बनवाया गया एक स्मारक है। मुख्य सड़क पर स्थित होने के कारण पुराने दिनों में वाइसराय के मेहराब को प्राचीन गोवा का प्रवेशद्वार कहा जाता था।

टैक्सी या रिक्षा लेकर प्राचीन गोवा पहुँचना बहुत आसान है। किराए का वाहन लेकर आप स्वयं ड्राइविंग करके भी यहाँ पहुँच सकते हैं। सबसे अच्छा निजी वाहन से जाना रहेगा क्योंकि वेल्हा गोवा में बहुत सारी चीज़ें व स्थान हैं जो रुक-रुककर देखने योग्य है।

प्राचीन गोवा इसलिए है प्रसिद्ध

प्राचीन गोवा मौसम

प्राचीन गोवा
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  • Partly cloudy
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घूमने का सही मौसम प्राचीन गोवा

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कैसे पहुंचें प्राचीन गोवा

  • सड़क मार्ग
    प्रसिद्ध मुंबई-गोवा राजमार्ग अथवा राष्ट्रीय राजमार्ग-17 से होते हुए आप मुंबई से गोवा पहुँच सकते है जो मुंबई को सीधे गोवा से जोड़ता है। हालांकि कुछ समय पहले यह रास्ता दो लेन एकसाथ होने के कारण कम प्रयोग किया जाने लगा जिसमें एक लेन ऊपर और एक लेल नीचे है जो कि न केवल खतरनाक है बल्कि आपकी यात्रा को भी लंबा बनाती है। इससे अधिक सुविधाजनक आठ लेनयुक्त एक्सप्रेस मार्ग है जो मुंबई से पुणे की ओर जाता है और जो सतारा राजमार्ग से होते हुए महाराष्ट्र के दूसरे छोर पर स्थित सावंतवाड़ी तक पहुँचता है। गोवा, यहाँ से कुछ ही मिनटों की दूरी पर है। मुंबई, पुणे और महाराष्ट्र के दूसरे शहरों से गोवा के लिए अनेक आरामदायक बस सेवाएँ उपलब्ध हैं। फिर भी आपको लो-फ्लोर वोल्वो सेमी स्लीपर लेने का सुझाव दिया जाता है।
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  • ट्रेन द्वारा
    उत्तर, दक्षिण तथा केंद्रीय भारत से गोवा रेलमार्ग के द्वारा भली प्रकार जुड़ा है। अधिकतर यात्री सुविधाजनक समय पर मुंबई और गोवा के बीच चलने वाली सुविधाजनक रेल द्वारा यात्रा करते हैं। इससे बेहतर और क्या होगा, रातभर का सफर और किसी को महसूस तक नहीं होता।
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  • एयर द्वारा
    दक्षिणी गोवा में डाबोलिम हवाईअड्डा मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरें से भली प्रकार जुड़ा है। हवाईअड्डे से आने जाने के लिए टैक्सियाँ तैयार मिलती हैं। डाबोलिम कोई अंतर्राष्ट्रीय या फिर कस्टम हवाईअड्डा नहीं है, इसलिए विदेशीयात्रियों को मुंबई या दिल्ली जैसे अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे से होकर आना पड़ता है।
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