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तो क्या ओडिशा के इस मंदिर की तर्ज पर बना था मध्यप्रदेश का खजुराहो ?

ओल्ड भुवनेश्वर के एक खूबसूरत बगीचे में खड़ा राजारानी मंदिर ओडिशा के चुनिंदा खास प्राचीन मंदिरो और सांस्कृतिक धरोहरो में से एक है। यह एक ऐतिहासिक मंदिर है, जो अपने अंदर अतीत से जुड़े कई राज समेटे हुए है। माना जाता है कि इस मंदिर का असल नाम 'इंद्रेश्वर मंदिर' है, जो 11 शताब्दी से संबंध रखता है। अपनी खास विशेषताओं की कारण इसे 'प्यार का मंदिर' कहकर भी संबोधित किया जाता है। पंचरथ शैली में बना यह मंदिर पर्यटकों द्वारा राज्य के ज्यादा देख जाने वाले मंदिरों में भी शामिल है।

वास्तुकला और खूबसूरती के मामले में यह एक शानदार मंदिर है, जो किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकता है। राजारानी मंदिर की नक्काशीदार कामुक मूर्तियां मध्य प्रदेश के खजुराहो की याद दिलाती है। इस लेख के माध्यम से जानिए क्यों आपको इस मंदिर की सैर करनी चाहिए।

जुड़े हैं कई ऐतिहासिक राज

जुड़े हैं कई ऐतिहासिक राज

PC- Bernard Gagnon

इतिहासकारों की मानें तो इस मंदिर का निर्माण 11वीं से 12 शताब्दी के बीच हुआ था, जिसे पुरी जगन्नाथ मंदिर का समकालीन माना जाता है। इसके अलावा कई इतिहासकार इस तथ्य को भी सामने रखते हैं कि मध्य भारत के अधिकांश मंदिरों की वास्तुकला इसी मंदिर से उत्पन्न हुई हैं, जिनमें खजुराहो का भी नाम आता है। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है, इस पर सटीक कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राजारानी मंदिर की कामुक मूर्तियां, खजुराहो की तरह ही उत्तेजित करती हैं। आकर्षक नक्काशी के साथ ये मूर्तियां पर्यटकों को काफी ज्यादा प्रभावित करती हैं। आगे जानिए इस मंदिर से जुड़े और भी दिलचस्प तथ्यों के बारे में।

किए जा चुके हैं, कई सर्वेक्षण

किए जा चुके हैं, कई सर्वेक्षण

PC-Bernard Gagnon

मंदिर निर्माण के सही काल को जानने के लिए यहां कई सर्वेक्षण भी हो चुके हैं। मंदिर की मूर्तिकला और नक्काशी के आधार पर इतिहासकारों ने इस मंदिर को 11 वीं शताब्दी के मध्य में दिनांकित है। उड़ीसा मंदिरों पर 1953 में एस के सरस्वती द्वारा किया गया सर्वेक्षण इसी तारीख के विषय में बताता है। ओडिशा के मंदिर पर व्यपाकर विश्लेषण करने वाले पाणिग्रही, लिंगराज मंदिर और मुक्ताश्वर मंदिर के बीच की एक अनिर्दिष्ट तारीख के बारे में बताते हैं। इतिहासकार जॉर्ज मिशेल का मानना है कि यह मंदिर लिंगराज मंदिर का समकालीन है।

वास्तुकला और धार्मिक महत्व

वास्तुकला और धार्मिक महत्व

PC- SUDEEP PRAMANIK

ओडिशा का यह मंदिर, दो भागों में बंटा है, एक गर्भगृह और दूसरा जगमोहन जहां से तीर्थयात्री देवालय को देखते हैं। माना जाता है कि प्रारंभिक देउल वाले मंदिर बिना जगमोहन यानी सभा कक्ष के हुआ करते थे। ऐसे कुछ प्राचीन मंदिर भुवनेश्वर में देखे गए थे। जबकि बाद में मंदिरों में अलग-अलग कक्ष भी देखे गए हैं, जैसे त्योहार हॉल और प्रसाद हॉल। राजारानी मंदिर एक उभरे हुए मंच पर बना है, जिसके निर्माण में लाल और पीले बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जिसे स्थानीय रूप में राजारानी कहा जाता है। भुवनेश्वर में मौजूद अधिकांश शिव मंदिरों के नाम के अंत में इश्वर लगता है, लेकिन यह राजारानी मंदिर एक अनोखा मंदिर है।

मंदिर के गर्भगृह में किसी भी देवी या देवता की मूर्ति नहीं है। लेकिन मंदिर की कुछ विशेषताओं के कारण इसे शिव से जोड़ा जा सकता है। यहां की दीवारों पर विभिन्न मूर्तियां के शिव विवाह का चित्रण , नटराज, पार्वती को दर्शाया गया है।

राजारानी संगीत समारोह

राजारानी संगीत समारोह

PC- Udit pratap 141

ओडिशा सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा यहां प्रतिवर्ष 18 से 20 जनवरी के मध्य राजारानी संगीत समारोह का आयोजन किया जाता है। यह समारोह शास्त्रीय संगीत पर केंद्रीत रहता है जिसमें शास्त्रीय संगीत की सभी तीन शैलियों - उत्तर भारतीय, कर्नाटक और ओडिसी को महत्व दिया जाता है। इन तीन दिनों के दौरान भारत के अलग-अलग भागों से कलाकारों का आगमन होता है। इस संगीत उत्सव की शुरुआत 2003 में की गई थी।

कैसे करें प्रवेश

कैसे करें प्रवेश

PC- Amartyabag

राजारानी मंदिर राजधानी शहर भुवनेश्वर में स्थित है, जहां आप तीनों मार्गों से पहुंच सकते हैं, यहां का नदजीकी हवाईअड्डा भुवनेश्वर एयरपोर्ट है, रेल मार्ग के लिए आप भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन का सहारा ले सकते हैं। अगर आप चाहें तो यहां सड़क मार्गों से भी पहुंच सकते हैं, बेहतर सड़क मार्गों से भुवनेश्वर आसपास के राज्यों और शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

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