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8 राजस्थानी लोकनृत्‍य, भवई, कालबेलिया...

घूमर, कालबेलिया के आगे भी राजस्थान में कई लोकनृत्‍य हैं। आइये बात करते हैं आठ राजस्थानी लोक नृत्‍यों की...
Ajay Mohan
सर्दियों के मौसम में लोग राजस्थान में पर्यटकों की संख्‍या हर साल बढ़ जाती है, इस साल भी माहौल काफी खुशनुमा है। हर तरफ लोकगीतों एवं नृत्‍यों की बहार है। आइये बात करते हैं यहां के लोक नृत्‍यों की।

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घूमर भील जनजाति से आता है। इस नृत्‍य के माध्‍यम से लोग देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। शादी-ब्‍याह, व बड़े आयोजनों पर यह नृत्‍य होता है। कई बार किसी उम्रदराज़ व्‍यक्ति की मृत्‍यु पर भी यह नृत्‍य किया जाता है।
घूमर

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कालबेलिया नृत्‍य यूनेस्को की सूची में शामिल है। यह नामेसाके जनजाति का नृत्‍य है। यह सपेरा नृत्‍य से मिलता जुलता नृत्‍य है।
कालबेलिया
भवई
भवई नृत्‍य राजस्‍थान के कालबेलिया, जाट, मीणा, भील और कुम्‍हार समुदाय से आता है। यह सिर पर आठ से नौ कलश रख कर किया जाता है।
यह राजस्‍थान के शेखावती क्षेत्र का नृत्‍य है, जिसमें पुरुष पगड़ी बांध कर नृत्‍य करते हैं और दूसरा पुरुष घोड़ा या शेर बनकर इसमें शामिल होता है।
कच्‍छी घोड़ी
चारी नृत्‍य अजमेर और किशनगढ़ क्षेत्र से आता है, जो खास तौर से बेटा पैदा होने पर, शादी ब्‍याह या त्‍योहारों पर किया जाता है।
चारी
गैर नृत्‍य में रंग बिरंगे कपड़े पहन कर डांस किया जाता है। इसका आयोजन जन्‍माष्‍टमी और होली पर भील समुदाय द्वारा खास तौर से किया जाता है।
गैर
इसमें कठपुतली का नृत्‍य होता है। नृत्‍य के माध्‍यम से किसी कहानी, कथा आदि का चित्रण किया जाता है।
कठपुतली नृत्‍य
होली के मौके पर चांग नृत्‍य की धूम आप रास्‍थान में आसानी से देख सकते हैं। यह बीकानेर, चुरु, झुनझुनू और सीकर क्षेत्र से आता है।
चांग
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