मैसूर में विजयादशमी का पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है। इसके आखिरी दिन मनाये जाने वाले उत्सव को जम्बू सवारी या अम्बराज कहा जाता है।
अम्बराज के दिन चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा को मैसूर शहर में घूमाने का काम गजराज बलराम किया करता था।
नर हाथी बलराम कूर्ग के जंगलों में अनाथ पाया गया था। वहां से उसे मैसूर में लाया गया और उसके लिए विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी।
आम हाथियों के विपरित बलराम काफी शर्मिला और अंतर्मुखी स्वभाव का था। प्रशिक्षण के दौरान वह अक्सर भाग जाने की फिराक में रहता था।
दशहरा जुलूस में ढोल-नगाड़ों की आवाज से वह बिदक ना जाए, इसलिए उसे प्रशिक्षण देते समय गोलियां, जोर-जोर से ढोल बजाए जाते थे।
दशहरा जुलूस का लिडर बनाने के लिए बलराम पहली पसंद नहीं था। गजराज द्रोण के उत्तराधीकारी के तौर पर अर्जुन को पहले यह जिम्मेदारी सौंपी जानी थी।
लेकिन अपने ही महावत को गलती से कुचलकर मार डालने की वजह से अर्जुन के बजाए बलराम को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी।
एक दिन तालाब में नहाते समय गाड़ियों की आवाज से हाथी अचानक चौंक गये और इस भागादौड़ी में महावत अर्जुन की पीठ से गिरकर उसके पैरों के नीचे कुचल गया।
लोगों का मानना था कि एक हाथी जिसने किसी आदमी को मार डाला हो, वह धार्मिक कार्यों को करने के योग्य नहीं था। इसलिए बलराम को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी।
एक बार बलराम के महावत के परिवार को उनकी सवारी देखने से रोका गया तो उसने बलराम का काम करना छोड़ दिया था।
इसके बाद बलराम ने किसी और के हाथों से खाना खाने से इंकार कर दिया था। वह सिर्फ अपने महावत के हाथों से ही खाना खाता था।
अपने शांत स्वभाव के कारण 4590 किलो वजनी गजराज बलराम ने लोगों का दिल जीत लिया था।
घटते वजन के कारण चामुंडेश्वरी देवी का 750 किलो का स्वर्ण हावड़ा बलराम ने उठाना बंद कर दिया था। उसके स्थान पर अर्जुन को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी।
लेकिन बलराम दशहरा जुलूस का नेतृत्व किया करता था। मुंह में अल्सर और लंबी बीमारी के बाद बलराम की मौत हो गयी है।