राजकुमार शाहजहां अपने पिता जहांगीर को जबरदस्ती गद्दी से हटाने चाहता था। इसके लिए उन्होंने पिता के खिलाफ 1622 में विद्राह भी किया। हालांकि इसमें उन्हें मुंह की खानी पड़ी। 1627 में जहांगीर की मृत्यु के बाद ही उन्हें गद्दी पर बैठने का मौका मिला।
ऐतबार खान का शाब्दिक अर्थ होता है- भरोसेमंद इंसान। शायद यही वजह थी कि ऐतबार खान को बादशाह जहांगीर के हरम अर्थात शाही महिलाओं के रहने की जगह, का जिम्मा सौंपा गया था। 1663 में जब जहांगीर के बेटे शाहजहां ने आगरा को हड़पना चाहा तो ऐतबार खान ने उसकी मदद करने से इनकार कर दिया। उसकी ईमारदारी से प्रभावित होकर जहांगीर ने उसे मुमताज खां के खिताब से नवाजा।
उस समय के रिवाज के अनुसार जब ऐतबार खान आगरा में थे तो उन्होंने अपने लिए एक मकबरे का निर्माण करवाया था। यह मकबरा एक बड़े जलाशय गुरु का ताल के पास स्थित है।
पहले इस स्थान पर ऐतबार खान के मकबरे के अलावा एक मस्जिद और एक सराय भी हुआ करती थी। इस स्मारक का एक बड़ा हिस्सा रेलवे ट्रैक और सड़क निर्माण के दौरान नष्ट हो गया था। आज यहां एक मस्जिद और समाधि ही शेष बचा है।
इसमें 12 खंभा होने के कारण यह मकबरा बारह खंभा के नाम जाना जाता है। ऐताबार खान का कब्र वर्गाकार मकबरे में स्थित है, जहां बलुआ पत्थर से बने गेट के द्वारा पहुंचा जा सकता है।



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