रूमी दरवाजा को तुर्कीश द्वार के नाम से भी जाना जाता है, जो 13 वीं शताब्दी के महान सूफी फकीर, जलाल-अद-दीन मुहम्मद रूमी के नाम पर पड़ा था। इस 60 फुट ऊंचे दरवाजे को सन् 1784 में नवाब आसफ - उद - दौला के द्वारा बनवाया गया था। यह द्वार अवधी शैली का एक नायाब नमूना है और इसे लखनऊ शहर के लिए प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है।
इस गेट के ऊपर नवाबों के युग में एक लैम्प रखी गई थी, जो उस युग में रात के अंधेरे में रोशनी प्रदान करती थी। यह जगह और भी लुभावनी हो जाती है जब इस द्वार पर बनी मेहराबों के पास में लगे सुंदर से फव्वारों से कली के आकार में पानी गिरता है।
इस दरवाजे को प्रसिद्ध बनाने के लिए सबसे असल श्रद्धांजलि रसेल को दी जानी चाहिए, वह न्यूयार्क टाइम्स के संवाददाता थे और उन्होने ही 1858 में लखनऊ की छावनी को ब्रिटिश सेना के प्रविष्टि कवर पर छापा। उन्होने अपनी रिर्पोट में कहा था कि रूमी दरवाजा से छत्तर मंजिल तक का रास्ता सबसे खूबसूरत और शानदार है जो लंदन, रोम, पेरिस और कांस्टेंटिनोपल से भी बेहतर दिखता है।



Click it and Unblock the Notifications