बिहार के पर्यटन स्थलों के बारे में तो आपने खूब सुना होगा। क्या आपने किसी ऐसे गांव के बारे में सुना है जिसे 'मोर-गांव' कहा जाता है। मोर जो हमारा राष्ट्रीय पक्षी है।
बिहार में ऐसा एक नहीं बल्कि दो गांव है जहां सैंकड़ों मोर-मोरनियों का बसेरा है।
हम आपको बिहार के 'मोर-गांव' के बारे में बता रहे हैं, जिस गांव के हर आंगन में मोर खेलते और नाचते नजर आते हैं।
सहरसा जिला मुख्यालय से लगभग 6 किमी दूर सत्तर कटैया प्रखंड में बसा है आरण गांव। वर्तमान समय में यहां करीब 500 मोर और मोरनियां रहती हैं।
आरण गांव
स्थानीय लोगों के साथ मोर काफी अच्छी तरह से घुल-मिल गये हैं लेकिन किसी बाहरी अंजान व्यक्ति को देखकर वे डरकर भाग जाते हैं।
किसी भी मोर को पिंजरे में नहीं रखा जाता है। वे गांव के घरों की छतों, मुंडेर और आंगनों में खेलते-घूमते हैं। अगर कोई मोर गांव से बाहर भी चला जाता है तो वह खुद वापस लौट आता है।
गांव के एक बुजूर्ग हरिनंदन कुमार वर्ष 1985 में पंजाब से मोर-मोरनी का एक जोड़ा यहां लाए थे। उनका परिवार ही आज 500 मोर-मोरनियों पर पहुंच चुका है।
पूर्वी चम्पारण जिले के कल्याणपुर प्रखंड में है दूसरा 'मोर-गांव' माधोपुर गोविंद। यहां किसी वक्त 500 से ज्यादा मोर रहा करते थे।
माधोपुर गोविंद
लेकिन समय के साथ उनकी ठीक से देखभाल ना होने और संरक्षण के अभाव में अब यह संख्या आधी से भी कम रह गयी है।
इस गांव में भी मोर खुले में घूमा और खेला करते थे। ग्रामीण ही इन मोरों की सुरक्षा और इन्हें फसलों के बीज खिलाते थे।
वर्ष 1950 में गांव के कुछ लोग प्रसिद्ध सोनपुर मेला देखने गये थे और वहां से लौटते समय वे अपने साथ मोर-मोरनी का एक जोड़ा लेकर आए थे। इसे खुले में छोड़ दिया गया था।
बताया जाता है कि फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल, गन्नों की खेती की वजह से सियार के बढ़ते उपद्रव के कारण गांव में मोरों की संख्या में तेजी से कमी आयी है।