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होम » स्थल » झालावाड़ » आकर्षण
  • 01भीमसागर डेम

    भीमसागर डेम

    भीमसागर बाँध झालावाड़ से 24 किमी दूर है। यह उजाड़ नदी पर बनाया गया है। यह मौ बोरदा के खंडहरों के पास है जो खिची चौहानों की राजधानी हुआ करती थी। मंदिरों, महलों, और मुसलमानों के लिए मस्जिदों और राजपूतों के मलबे इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसके अलावा पर्यटक यहाँ...

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  • 02दलहनपुर

    दलहनपुर

    दलहनपुर , झालावाड़ से 54 किमी दूर है और छापी नदी के किनारे पर स्थित है। इस क्षेत्र के मंदिर नक्काशी किये गए स्तंभों, कामुक मूर्तियों एवं तोरण के लिए प्रसिद्ध हैं। इस क्षेत्र में एक सिंचाई बाँध का काम शुरू है। इस जगह की सुंदरता हरे भरे घने जंगलों और पशुचारे के कारण...

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  • 03पृथ्वी विलास महल

    पृथ्वी विलास महल

    पृथ्वी विलास महल को राजा भवानी सिंह ने वर्ष 1912 ई. में बनवाया था। आजकल यहाँ पर इस जगह के पूर्व शासक के परिवार का एक सदस्य इस महल में रहता है। इस महल के अंदर तीन तरफ से जाया जा सकता है। इस महल में एक मोनोग्राम भी है जो पूर्व शासकों के शौर्य और विनम्रता की कहानियां...

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  • 04शासकीय संग्रहालय

    शासकीय संग्रहालय

    शासकीय संग्रहालय को वर्ष 1915 में स्थापित किया गया था। दुर्लभ पांडुलिपियां, सुंदर मूर्तियाँ, पुराने सिक्के और चित्र इस संग्रहालय के मुख्य आकर्षण हैं। इसके अलावा आप यहाँ 5वीं और 7वीं शताब्दी के प्राचीन शिलालेख भी देख सकते हैं।

    खुदाई में मिली कई अलग अलग...

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  • 05अतिशय जैन मंदिर

    अतिशय जैन मंदिर

    अतिशय जैन मंदिर प्रसिद्ध जैन मंदिर हैं जिनका निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में हुआ था। ये मंदिर झालावाड़ से 34 किमी दूर स्थित हैं। मंदिर की भव्यता इसकी सुंदर वास्तुकला में झलकती है। भगवान् आदिनाथ की ध्यानावस्था में बैठी हुई 6 फीट ऊँची मूर्ती दूर दूर के क्षेत्रों से...

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  • 06बौद्ध गुफाएं और स्तूप

    बौद्ध गुफाएं और स्तूप

    बौद्ध गुफाएं और स्तूप झालावाड़ के मुख्य आकर्षण हैं। ये चट्टानों में काटी गई मौलिक गुफाएं कोलवी गाँव में खुदाई के दौरान मिली थीं। पुरातत्व और इतिहास की दृष्टी से ये गुफाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह गाँव झालावाड़ शहर से 90 किमी दूर है। भगवान बुद्ध की गजरूप संरचना और...

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  • 07भवानी नाट्य शाला

    भवानी नाट्य शाला

    भवानी नाट्य शाला झालावाड़ किले के पास स्थित है। इसका निर्माण वर्ष 1921 में हुआ था। यह शानदार थियेटर कई यादगार नाटकों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का साक्षी रहा है। इस स्थान का मुख्य आकर्षण इसकी अनूठी भूमिगत संरचना है। इसके अलावा मंच भी कम उंचाई पर बनाया गया है जिससे...

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  • 08जैन श्वेतांबर नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर

    जैन श्वेतांबर नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर

    जैन श्वेतांबर नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर झालावाड़ के सुदूर दक्षिणी भाग में स्थित है और शहर से 150 किमी की दूरी पर स्थित है। यह पवित्र स्थल भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है जिसका निर्माण गुजरात, महाराष्ट्र और मालवा (मध्य प्रदेश) के जैन समुदाय द्वारा किया गया है। इस...

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  • 09गंगधार का किला

    गंगधार का किला

    गंगधार का किला , झालावाड़ से 140 किमी की दूरी पर है। इस स्थान का मुख्य आकर्षण एक प्राचीन शिलालेख है। इसके अलावा यात्री आस पास के मंदिर भी देख सकते हैं।

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  • 10गागरों किला

    गागरों किला झालावाड़ से 12 किमी की दूरी पर स्थित है। इस किले का निर्माण सातवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य हुआ था। यह तीन ओर से अहू और काली सिंध के पानी से घिरा हुआ है। पानी और जंगलों से सुरक्षित यह किला कुछ ही ऐतिहासिक स्थलों में से एक है जिसमें ‘वन’...

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  • 11मनोहर थाना किला

    मनोहर थाना किला

    मनोहर थाना किला, झालावाड़ से 90 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके नाम का शाब्दिक अर्थ 'सुंदर चौकी’ है। यह किला दो नदियों परवान और कलीखाड के मिलने का साक्षी है। यह दोहरे स्तर वाला दुर्ग और कंगूरे वाला है, क्योंकि प्राचीन समय में, सुरक्षा की दृष्टि से यह...

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  • 12झालावाड़ किला

    झालावाड़ किले को गढ़ महल के नाम से भी जाना जाता है और यह झालावाड़ शहर के मध्य स्थित है। महाराजा राणा मदन सिंह ने इस किले को 1840-1845 के दौरान बनवाया था। आजकल जिलाधीश कार्यालय (कलेक्टोरेट) और कई अन्य सरकारी कार्यालय इस किले में है। महाराजा के उत्तराधिकारियों ने इस...

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  • 13झालरा पाटन

    झालरा पाटन

    झालरा पाटन, झालावाड़ से 7 किमी की दूरी पर स्थित है। इस स्थान की मुख्य विशेषता यह है कि पूरा शहर एक दीवार से घिरा हुआ है। महाराजा विक्रमादित्य के पोते परमार चन्द्र सेन ने इस शहर का निर्माण किया था। झालरा पाटन चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित है और इसे ‘मंदिर की...

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  • 14चन्द्रभागा मंदिर

    चन्द्रभागा मंदिर

    चन्द्रभागा मंदिर चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित हैं और झालावाड़ से लगभग 7 किमी दूर हैं। छठवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य बने हुए ये मंदिर पुराने दिनों की कला का उत्तम उदाहरण है। ख़ूबसूरती से गढ़े गए स्तंभ और मेहराब के आकर के प्रवेश द्वार बीते हुए युग के कलाकारों...

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