दखिनपत सतरा माजुली का एक प्रसिद्ध सामाजिक-धार्मिक संस्था है। इसकी स्थापना वामशीगोपाल के अनुयायी ने किया था। यह कला और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है और यहां विभिन्न तरह की मूर्ति, पेंटिंग और नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। पहले यह सतरा अहोम वंश के राजाओं के संरक्षण में था। 1584 में स्थापित इस सतरे को हॉउस ऑफ डांस भी कहा जाता है, क्योंकि श्री शंकरदेव ने कई तरह के नृत्य रूपों में योगदान दिया है। सतरे के द्वार को धार्मिक रूपांकन और फूल व जानवर के चित्रों से सजाया गया है।
रासलीला नाम से जाना जाने वाला असम का राष्ट्रीय उत्सव भी यहां हर साल मनाया जाता है। इस दौरान यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालू आते हैं। इस सतरा के संस्थापक बनमालीदेव रासलीला के पक्षधर थे। यहां रहने वाले महंत को भक्त के नाम से जाना जाता है और वर्तमान में यहां 90 से 100 भक्त हैं।
ये संस्था सतराधिकार की निगरानी में है। सतराधिकार के द्वारा संत श्रीमंत शंकरादेव के अवशेष और हस्तलिपि को सुरक्षित रखा गया है। ये सतरें महापुरुजिया धर्म का अनुसरण करते हैं और यहां महाप्रभु जादवराय की पूजा की जाती है।



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