श्री प्रताप सिंह संग्रहालय को सन् 1898 में झेलम नदी के किनारे पर स्थापित किया गया था। शुरूआती दौर में इस संग्रहालय को तोष खाना के नाम से जाना जाता था जिसमें शॉल और शस्त्रों का प्रर्दशन किया जाता था। संग्रहालय में परीहासपोरा, अवंतीपुरा और पंडेरेंनाथ आदि कलाकृतियों का भी पहली बार प्रर्दशन किया गया है। संग्रहालय में कीमती और प्राचीन टेराकोट्टा हेड भी रखे हुए हैं जो एक बौद्ध स्थल उस्कार से प्राप्त तीसरी सदी के नायाब नमूने हैं। इसके अलावा, संग्रहालय में 4 और 5 वीं सदी के हरवान से प्राप्त मोल्डेड टेराकोट्टा को भी इस संग्रहालय में देखा जा सकता है।
संग्रहालय में बौद्ध युग की कई प्राचीन वस्तुएं देखने को मिलती है। जैसे - ध्यान लगाए एक प्राचीन बौद्ध देवता लोकेश्वरा की मूर्ति और भगवान विष्णु की हरे पत्थर वाली मूर्ति जिसमें वह एक पक्षी पर बैठे है जो गरूड़ से मिलता जुलता है। इस मूर्ति से श्रद्धालु काफी आकर्षित होते हैं।
म्यूजियम में 5 वीं सदी की गांधार वास्तु शैली से जुड़ी कई कलाकृतियां रखी हुई हैं जो भगवान बुद्ध से जुड़ी हुई हैं। संग्रहालय में मौजूद विभिन्न कलाकृतियों को सावधानीपूर्वक तिथि, काल और शैली के हिसाब से सजाया गया है। संग्रहालय के कलेक्शन को कई श्रेणियों में जैसे - न्यूमिज़माटिक्स और पांडुलिपियों, लघु चित्रों, हथियार और बर्तन, घास और विलो काम, फर्नीचर, और सजावटी वस्तुओं और संगीत वाद्ययंत्र आदि में विभाजित करके रखा गया है ताकि पर्यटक आराम से उन्हे देख सकें और उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल कर सकें।
इन सभी के अलावा, संग्रहालय में कई अन्य श्रेणियां भी हैं जैसे - चमड़े के आइटम, मूर्तियां, टाइल्स और अन्य कलाकृतियां। वहीं कश्मीर की प्राकृतिक भागों की खुदाई से मिले पक्षियों और जानवरों के अवशेष भी यहां देखने को मिलते हैं।



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