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सीतामाता वन्यजीवन अभ्यारण्य, चित्तौड़गढ़

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सीतामाता वन्यजीवन अभ्यारण्य अरावली के पहाड़ों और मालवा के पठार पर फैला हुआ है। यह अभ्यारण्य घने पर्णपाती वनों से से घिरा हुआ है, जो केवल एक अकेला ऐसा वन है जहाँ इतनी बड़ी संख्या में सागौन के वृक्ष हैं। इसके अल्वा यहाँ बाँस, साल, आँवला और बेल के वृक्ष भी है, लगभग आधे से अधिक वृक्ष सागौन के हैं। इस अभ्यारण्य से होकर जाखम और करमोई नदियाँ बहती हैं। जाखम नदी पर एक बाँध बना है जो स्थानीय लोगों की सिंचाई की आवश्यकताओं को पूरा करता है।

इस अभ्यारण्य में जानवर जैसे तेंदुआ, हाइना, सियार, जंगली बिल्ली, साही, चित्तीदार हिरण, भालू और चार सींगों वाला मृग देखें जा सकते हैं। उड़ने वाली गिलहरी जो एक रोचक निशाचर प्राणी है, उसे आप यहाँ रात में वृक्षों के बीच उड़ता हुआ देख सकते हैं। इस स्थान का पौराणिक महत्व भी है क्योंकि ऐसा माना जाता है की भगवान राम की पत्नी सीता अपने निर्वासन के दौरान यहाँ ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में रही थी।

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