शास्त्रों के अनुसार, भगवान आदिनाथ ने अपना राज्य त्याग दिया था और तपस्वी जीवन में प्रवेश कर लिया था। उन्होने तपस्वी के जीवन को बखूबी निभाया और एक साल से भी ज्यादा समय के लिए व्रत पर रहे। किसी भी व्यक्ति ने उन्हे व्रत तोडने के लिए या भोजन ग्रहण करने का अनुरोध नहीं किया, क्योंकि लोगों को उनके अनुष्ठान प्रक्रिया का सही पता नहीं था।
जैसे ही वह हस्तिनापुर पहुंचे, उनके छोटे भाई श्रेयांश कुमार, जो हस्तिनापुर के शासक थे, ने भगवान की परीक्षा के बारे में जाना। उन्होने अपने पिछले जन्म से जुड़ी प्रक्रियाओं को याद किया और तदनुसार, वैसाख शुक्ल तृतीया के दिन भगवान को गन्ने के जूस की पेशकश की।
श्रेयांश कुमार ने एक स्तुप और एक मंदिर बनवाया, ठीक उसी स्थल पर जहां भगवान ने अपना उपवास तोड़ा था। इसे पराना - उपवास तोड़ - मंदिर आदिनाथ निशियाजी कहा जाता है। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ के चरणों के निशान भी एक पत्थर पर बने हुए है। निशिया जी का मंदिर, हस्तिनापुर में गंगा नहर या कैनॉल के पास स्थित है।
हर साल हजारों पर्यटक निशियाजी में भगवान आदिनाथ के पैरों के निशान की पूजा व अर्चना के लिए आते है। इस मंदिर में कई पर्वो जैसे - दास लक्षण पूजा दिवस, अक्षय तृतीया पर्व, होली और कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष पूजा व कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक वर्ष मार्च माह में यहां महायज्ञ का आयोजन किया जाता है।



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