कतील दक्षिण कन्नड़ ज़िले का एक मठ शहर है, जो शक्ति पूजा का एक महत्वपूर्ण पीठ और पौराणिक शिक्षा में ओतप्रोत है। यहाँ नंदीनी नदी के किनारे दुर्गा परमेश्वरी मंदिर है जो पूरे भारत से कई श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
क्षेत्र के पीछे की महान कथा
प्राचीन काल में, एक असुर अरुनासुर की गतिविधियों से यह क्षेत्र प्रलयंकारी सूखे में डूब गया था। साधू जबाली, जो गहरे ध्यान में थे ने अपनी दिमाग की आँखों से लोगों की पीड़ा को देखा। उन्होंने उनपर दया कर उस परिस्थिति से उन्हें निकालने की सोची। उन्होंने यज्ञ करने की सोची और इसके लिए वह ईश्वरीय धेनु, कामधेनु को नीचे लाना चाहते थे।
इसके लिए उन्होंने देवों के देव इन्द्र से आज्ञा ली, जिन्होंने साधू से कहा कि कामधेनु वरुणलोक गया हुआ है, पर वह उसकी जगह उनकी बेटी नंदीनी को ले सकते हैं। नंदीनी ने अहंकारपूर्वक यह कहकर जाने से इनकार कर दिया कि धरती पापियों की जगह है और वह वहां कभी पांव नहीं रखेगी।
साधू ने उससे विनती की, लोगों की पीड़ा के बारे में बताया और बताया की उनके नीचे आने से, वह लोगों को कष्ट से मुक्ति दिलाने में मदद कर सकती हैं। गुस्से में आकर गुरु जबाली ने नंदीनी को नदी बनकर धरती पर गिरने का श्राप दिया। दंडित नंदीनी ने गुरु से माफ़ी मांगी और श्राप से मुक्ति का निवारण पूछा।
साधू ने उसको देवी दुर्गा की अराधना करने को कहा जो उसे मुक्त करेंगी। नंदीनी ने देवी की पूजा की जो उसके सामने प्रकट हुईं। देवी दुर्गा ने गुरु के श्राप की पूर्ती के लिए नंदीनी को नदी बनकर बह जाने को कहा। उन्होंने नंदिनी को यह आश्वासन दिया किवह खुद उसकी बेटी बन कर उसके श्राप से उसे मुक्त करवाएंगी।
नंदिनी तब कनकगिरी के कतील से नदी के रूप में प्रकट हुई। इस नदी के किनारे साधू जबाली ने यज्ञ का आह्वान किया और बारिश लौट आई और अपने साथ शांति और यश साथ लायी।
और अधिक पौराणिक कथा में झांकना
इस बीच अरुणासुर ने तपस्या कर अपनी ताकत बढ़ा ली थी और भगवान ब्रम्हा से वरदान प्राप्त कर लिया था। ब्रम्हा ने उसे वरदान दिया था कि वह किसी दोपाया या चौपाया जीव के द्वारा नहीं मारा जायेगा, और कोई अस्त्र भी उसे नहीं मार पायेगा। इस वरदान से प्रोत्साहित होकर, अरुणासुर ने देवों को पराश्त किया और उसका अत्याचार बढ़ गया। तब देवों ने देवी दुर्गा से मदद की गुहार लगायी।
अरुणासुर के सामने देवी सुन्दर नवयुवती बनकर प्रकट हुईं। मंत्रमुग्ध असुर ने उसका पीछा किया। जब उसने बताया कि वह असल में कौन थी, अरुणासुर ने उसे मारने की कोशिश की, पर नवयुवती पत्थर में बदल गयी, और उस पत्थर से मधुमक्खी का एक छत्ता निकला और उसे तब तक काटता रहा जब तक वह मर नहीं गया। यह उस वरदान की पूर्ति के लिए हुआ की कोई दोपाया या चौपाया जीव या अस्त्र उसे नहीं मार सकता था।
देवों ने तब भ्रमाराम्बिका (मधुमक्खियों की रानी) से अपने परोपकारी और नम्र रूप धारण करने की प्रार्थना की। देवी तब अपना यह वादा पूरा करते हुए कि वह नंदिनी कि बेटी के रूप में जन्म लेंगी, सुन्दर रूप में नंदिनी नदी के बीच प्रकट हुई।
उस छोटे से द्वीप पर जहाँ वह प्रकट हुईं, कतील बन गया। संस्कृत में कती का मतलब 'मध्य'और ला का मतलब 'ज़मीन' है। कती और ला बन गया कतील, क्योंकि यह एक नदी के बीच का बिंदु है। इस छोटे द्वीप पर एक मंदिर का निर्माण हुआ और देवी की मूर्ति रखी गयी जो दुर्गा परमेश्वरी के नाम से प्रतिष्ठित हुआ।
क्षेत्र में उत्सव
नदी से घिरा हुआ सुन्दर मंदिर और पृष्ठभूमि में हरे भरे पहाड़ सब मिलकर इसे स्वर्गीय जगह बनाते हैं। यहाँ के विशेष पर्व हैं आठ दिन लम्बा मेष शंक्रमण उत्सव जो अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, नवरात्री का उत्सव, माघ शुद्द पूर्णिमा जिसमें नंदिनी नदी के जन्म का उत्सव मनता है, गणेश चतुर्थी, कृष्ण जन्माष्टमी, कधिरू हब्बा और लक्ष दीपोत्सव।
मंदिर ट्रस्ट यहाँ पर कई शैक्षणिक संस्थान चलाता है, अन्नधन प्रदर्शित करता है और लोक कलाएं जैसे यक्षगान को प्रोत्साहित और उसका समर्थन करता है।



Click it and Unblock the Notifications