कांकेर जिला छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है और रायपुर तथा जगदलपुर नाम के दो बहुत ही विकसित शहरों के बीच बसा है। पहले कांकेर बस्तर जिले का भाग था लेकिन 1998 में कांकेर को स्वतन्त्र जिले के रूप में पहचान मिली। यह जिला छोटे पहाड़ी इलाके में बसा है तथा महानदी, दूध, हटकुल, सिन्दूर और तुरूर नामक नदियाँ इस जिले के बीच से होकर बहती हैं।
कांकेर जिले में पाये जाने वाले ज्यादातर जंगल शुष्क पतझड़ प्रकार के हैं। कांकेर जिले में साल, सागौन और मिश्रित प्रकार के जंगल पाये जाते हैं। साल के जंगल जिले के पूर्वी भाग में, सागौन के भानुप्रतापनगर क्षेत्र में और मिश्रित प्रकार के जंगल ज्यादातर क्षेत्र में पाये जाते हैं। मिश्रित प्रकार के जंगल में औषधीय पौधों की विभिन्न प्रजातियाँ तथा अन्य आर्थिक महत्व के पौधे पाये जाते हैं।
कांकेर और इसके आसपास के पर्यटन स्थल
छत्तीसगढ़ राज्य अपने प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षणों के कारण तेजी से उभर रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले में कई पर्यटक आकर्षण हैं जिनमें कांकेर पैलेस शामिल है जोकि बहुत ही प्राचीन और प्रसिद्ध महल है। यह महल 12वीं सदी के स्वर्गीय महाराजाधिराज उदय प्रताप देव का है। अन्य रोचक स्थानों में गड़िया पर्वत, मलन्झकुडुम झरना, माँ शिवानी मन्दिर और चरे-मरे झरना प्रमुख हैं।
कांकेर – कला और संस्कृति
कांकेर का जनजातीय समाज विभिन्न आकार तथा प्रकार के सुन्दर हस्तशिल्प में निपुणता के लिये जाना जाता है। इन हस्तशिल्पों में लकड़ी पर नक्काशी, पीतल, टेराकोटा और बाँस के सामान शामिल हैं। जंगलों में बसे होने के कारण कांकेर जिले में गुणवत्तापरक लकड़ी पाई जाती है जिससे निपुण हाथों द्वारा बहुत ही आकर्षक लकड़ी के नक्काशी वाले हस्तशिल्प और विभिन्न प्रकार के फर्नीचर बनाये जाते हैं। ये वस्तुयें स्थानीय तथा बाहरी लोगों को आकर्षित करती हैं।
कांकेर के लोग लकड़ी तथा बाँस के शिल्प के लिये जाने जाते हैं। लकड़ी की नक्काशी जनजातीय लोगों बहुत ही प्रसिद्ध, सुन्दर और अनोखी कला है। ये लकड़ी की वस्तुयें उत्तम सागौन और सफेद लकड़ी की बनाई जाती हैं। इन लकड़ी की वस्तुओं में नमूने, मूर्तियाँ, दीवार के पैनेल और फर्नीचर के सामान शामिल हैं। इन हस्तशिल्पों को देश के विभिन्न भागों में भेजा जाता है और विदेशों में भी इसकी माँग है। जनजातीय लोग बाँस से वस्तुयें बनाने में भी निपुण हैं। बाँस की वस्तुओं में दीवार पर लटकाने वाली वस्तुयें, टेबल लैम्प और मेजपोश जैसी कुछ बढ़ियाँ कलाकृतियाँ शामिल हैं।
कांकेर आने का सबसे बढ़िया समय
कांकेर आने का सबसे बढ़िया समय अक्तूबर में मार्च के बीच का है जब तापमान सुहावना रहता है और स्थानीय भ्रमण के लिये आदर्श होता है।
कांकेर कैसे पहुँचें
जिले से 140 किमी की दूरी पर स्थित रायपुर हवाईअड्डे तथा रायपुर रेलवे स्टेशन के साथ कांकेर तक पहुँचना बहुत आसान है। हवाई यात्रा तथा रेलयात्रा के विकल्प के रूप में आप राष्ट्रीय राजमार्ग 43 से सड़क द्वारा भी यहाँ पहुँच सकते हैं जो कांकेर को आसपास के प्रमुख शहरों से जोड़ता है।



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