देवी भद्रकाली को समर्पित भद्रकाली मन्दिर देश के प्राचीनतम मन्दिरों में से एक है। चालुक्य वंश के शासक पुलाकेसी द्वितीय द्वारा 625 ईसा पूर्व निर्मित यह मन्दिर भद्रकाली झील के किनारे स्थित है। हिन्दू मान्यता के अनुसार देवी भद्रकाली (काली) को देवी माता के रूप में पूजा जाता है और मन्दिर के अन्दर पूज्य देवी की आठों भुजाओं को कवचों से सजाया गया है।
अलाउद्दीन खिलजी और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में मन्दिर जीर्ण शीर्ण हो गया था लेकिन 20वीं शताब्दी के मध्य में हुये जीर्णोद्धार ने इस बात को सुनिश्चित किया कि सबसे महत्वपूर्ण बची इमारतों में गिना जाने वाला तथा चालुक्य वास्तुकला शैली को प्रदर्शित करने वाला यह मन्दिर सही सलामत रहे।
मन्दिर के आसापास के क्षेत्र में कई प्राकृतिक चट्टाने है जो मन्दिर की सुन्दरता को और भी बढ़ा देते हैं, खासतौर से सूर्यास्त के समय।



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