स्वर्ण बावली को गोल्डन स्प्रिंग के नाम से जाना जाता है जो आशापति चोटी की तलहटी में स्थित है। माना जाता है कि इस पानी के स्त्रोत में डुबकी लगाने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं। अक्टूबर और नवंबर के महीने में नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं का बड़ा झुंड यहां स्नान करने आता है।
सर्दियों के दौरान यह जमी रहती है, बसंत के मौसम में बर्फ पिघलने के बाद श्रद्धालु स्नान करते है। विद्धानों के अनुसार, बहुत पहले एक बुजुर्ग महिला बावली से पानी भरकर घर ले जाती थी। कुछ दिनों बाद वह बीमार पड़ गई, उसके स्थान पर उसकी नातिन पानी भरने आई।
उसकी नातिन ने वहां एक सोने की ईट देखी और उसे अपने सफेद दुपट्टे से ढ़क दिया। वह अपने भाई को साथ लेकर दुबारा आई लेकिन तब तक उसके सारे प्रयास विफल हो चुके थे, वह ईट सदा - सदा के लिए छुप गई थी। कहा जाता है कि उस दिन से यह बावली हमेशा बर्फ से ढ़की रहती है। इसी धारणा को मानते हुए विद्धानों का मानना है कि आज भी गर्मियों के दिनों में भी पानी के इस स्त्रोत में बर्फ जमी रहती है।



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