सरगुजा - प्राचीन पुरातत्‍व और तीर्थस्‍थलों की सैर

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सरगुजा, छत्‍तीसगढ़ के उत्‍तरी भाग में स्थित है और इसकी सीमा उत्‍तर प्रदेश और झारखंड से मिलती है। इस स्‍थल की 50 प्रतिशत भूमि जंगल से ढकी हुई है जहां ढ़ेर सारे जंगल है। छत्‍तीसगढ़, भारत में 7 वां चाय पैदा करने वाला सबसे बड़ा राज्‍य है और सरगुजा और जसपुर, चाय की पैदावार के लिए सबसे उपयुक्‍त स्‍थल है।

कई पौराणिक कहानियां इस स्‍थल से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने 14 वषों के वनवास के दौरान इस स्‍थान की सैर की थी और इस जगह के कुछ स्‍थलों के नाम भगवान राम, सीता माता और लक्ष्‍मण जी के नाम पर रखे गए है। इन स्‍थानों को रामगढ़, सीता - भेनगरा और लक्ष्‍मणगढ़ कहा जाता है।

छत्‍तीसगढ़ के अन्‍य स्‍थानों की तरह, सरगुजा में भी कई शासकों का शासन रहा। यहां शासन की शुरूआत, नंद और मौर्य वंश से हुई थी, जो रक्षाल कबीले तक चला। यह शहर, ब्रिटिश शासन के तहत एक रियासत थी। हसदेव नदी , रिहंद नदी और कनहार नदी,सरगुजा की प्रमुख नदियों में से है। सरगुजा, ग्रीन ऑस्‍कर जीतने वाली फिल्‍म, द लास्‍ट माइग्रेशन के बैकड्रॉप के लिए भी प्रसिद्ध है जो क्षेत्र के हाथियों पर केंद्रित फिल्‍म थी।

सरगुजा और उसके आसपास स्थित अन्‍य पर्यटन स्‍थल

अपनी ऐतिहासिक और आदिवासी प्रभाव के अलावा, सरगुजा पर्यटकों की सैर के लिए प्रमुख स्‍थल है। सरगुजा में प्राचीन खंडहर और मंदिर की कलात्‍मक नक्‍काशी खुदी हुई है जो विस्‍तृत रूप में वहां दिखाई देती है। छत्‍तीसगढ़ को असंख्‍य झरनों के लिए जाना जाता है, सरगुजा भी उन झरनों वाले क्षेत्रों में से एक है। टाइगर प्‍वाइंट झरना, मानीपत में स्थित है। रामगढ़ और सीता बेनगरा गुफाएं है जो पूर्व ऐतिहासिक चित्रों के कारण प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम अपने 14 वर्षो के वनवास के दौरान यहां आकर ठहरे थे।

अम्बिकापुर, यहां के अन्‍य आकर्षणों में से एक है जिसे छत्‍तीसगढ़ में मंदिरों का शहर कहा जाता है। तात पाणि को साल भर गर्म पानी के स्‍त्रोत के रूप में जाना जाता है जहां गर्म पानी ही बहता है। दीपादिह, खंडहर और पुराने मंदिरों का केंद्र है जिसे पुरातत्‍व के लिए जाना जाता है। केदारगढ़, एक तीर्थ स्‍थल है।

लोग और संस्‍कृति

सरगुजा में अधिकतम जनसंख्‍या जनजातिय लोगों की है। पांडो और कोरवा, यहां की ऐसा जनजाति है जो जंगलों में निवास करती है। वही पूर्वजों का मानना है कि पांडव के वंशज, जो बाद में महाभारत के कौरवों के सदस्‍य बन गए थे, सरगुजा से जुड़े हुए थे। सरगुजा के किसानों का मुख्‍य व्‍यवसाय रेशम का उत्‍पादन है। भारिया भाषा, यहां की भारिया जनजाति के द्वारा सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली भाषा है। किसी भी प्रकार के नृत्‍य में जनजाति नृत्‍य का विशेष महत्‍व होता है।

शैला नृत्‍य में केवल पुरूष ही भाग लेते है जो एक समूह प्रदर्शन होता है। यह नृत्‍य विशेष अवसरों पर होता है जैसे - जनवरी में फसल कटने के दौरान, राजनीतिक रैलियों में, सार्वजनिक और राष्‍ट्रीय कार्यक्रमों में। बेंत की लकडिया इस नृत्‍य में इस्‍तेमाल होती है। सुआ नृत्‍य एक रोमेंटिक रूप है जहां युवा लड़कियां, विवाह योग्‍य लड़कों में उनकी रूचि को दर्शाती है। इसे धन के देवता को प्रसन्‍न करने के लिए भी किया जाता है। कर्मा नृत्‍य को पुरूष और महिलाओं के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जो करम के पेड़ को प्रसन्‍न करने के लिए गाते है। करम वृक्ष को अनुष्‍ठान और पूजा के लिए सबसे पवित्र माना जाता है।

सरगुजा का मौसम

सरगुजा में गर्मी और सर्दी अपनी चरम सीमा तक पड़ती है।

सरगुजा तक कैसे पहुंचे

सरगुजा तक जाने के लिए सड़क यातायात साधन और रेलवे सुविधा उपलब्‍ध है यहां के लिए हवाई यात्रा आसान नहीं है।

 

 

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