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गुरुद्वारा मंजी साहिब, करनाल

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गुरुद्वारा मंजी साहब ग्रैंड ट्रंक रोड के राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 1 से एक किलोमीटर की दूरी पर करनाल के व्यस्त सर्राफा बाजार में स्थित है। इतिहास के अनुसार, सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी उदासी नामक अपनी पहली धार्मिक यात्रा पर वर्ष 1515 में इस जगह आये थे। कहा जाता है कि यहां के बागीचे में वे एक टीले पर बैठे और भक्तों की एक बड़ी भीड़ के साथ पहले भजन या शबद गाये।

उन दिनों में, करनाल शहर के लोग प्रसिद्ध पीर अबू अली शाह कलंदर के नेतृत्‍व में मुस्लिम पीर या पवित्र पुरुषों के गहरे प्रभाव में थे। जब उन्‍होंने बढ़ती हुई भक्‍तों की भीड़ को देखा तो वे इस नए आगंतुक की खबर के साथ पीर के पास पहुंचे। दुर्भाग्य से कलंदर को जलन महसूस हुई और यह सुनकर वे नाराज हो गये।

उन्होंने एक दीवार बनायी, जिस वर वह बैठने लगे, दीवार को गुरु की ओर चलाने लगे, ताकि वह उनकी अलौकिक शक्तियों से प्रभावित हो जायें। लेकिन जैसे ही वह गुरु के करीब पहुंचे, दीवार रुक गई आगे चलना बंद कर दिया। तब उन्‍हें अहसास हुआ कि वह एक महान संत को हराने के लिए अपने चमत्कारों का दुरुपयोग कर मूर्खता कर रहे हैं। वह एक बार में दीवार से उतर गये और गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके पास चले गये।

सर्व विख्‍यात गुरु ने उन्‍हें सलाह दी कि वे अपनी दैवीय शक्तियों का इस्‍तेमाल इन बेकार के पांडित्‍य-प्रदर्शन पर न करें, बल्कि उनसे लोगों का भला करें। माना जाता है कि सिखों के छठे गुरु, गुरु हरकिशन साहिब भी 1663 में दिल्‍ली की यात्रा के दौरान इस स्‍थान पर आये थे।

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