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भारत की स्वतंत्रता से पहले की 10 लघु कथाएं जो आपको सोचने पर कर देंगी मजबूर

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हम जब शहीदों को याद करते हैं तो हमारी ऑंखों में उनके चेहरे नज़र आने लगते हैं, दिमाग में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी कथाएं घूमने लगती हैं और देश भक्ति के गीतों की गूंज हमारे कानों को एक अलग सुकून देते हैं। ऐसे में हम आपके सामने जो 10 असली कथाएं लेकर आये हैं, उन्‍हें पढ़ने के बाद आपको ऐसा प्रतीत होगा मानो आप दादा-दादी से स्‍वतंत्रता के पूर्व भारत की कोई कहानी सुन रहे हैं।

हमें पक्का विश्‍वास है कि ये दस की दस लघु कथाएं आपको बेहद पसंद आयेंगी और तो और आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी। चलिए शुरू करते हैं स्‍वतंत्रता के पहले के समय की दस ऐतिहासिक कथाएं -

Kalka Shimla Mail

1. बेहद दिलचस्प है कालका-शिमला रेल की शुरुआत, जानिए कैसे एक पत्र से शुरू हुई ये ट्रेन

दरअसल नवंबर, 1847 में दिल्ली द्वारा जारी एक गैजेट में शिमला को कालका से जोड़ने का सुझाव दिया गया था। जिसके बाद 1864 में गर्मियों के मौसम में शिमला को ब्रिटिश इंडिया की राजधानी बना दिया गया औ यहीं पर भारतीय सेना का मुख्यालय भी बनाया गया। ऐसे में साल दो बार पूरी सरकार को शिमला ट्रांसफर किया जाना आवश्यक हो गया। हालांकि शुरुआत में इसके लिए बैलगाड़ी, घोड़े आदि का इस्तेमाल किया गया। लेकिन बाद में दिल्ली-कालका लाइन को शिमला तक जोड़ दिया गया।

AIr India

2. द्वितीय विश्व युद्ध में एयर इंडिया की भूमिका

बहुत कम लोग जानते हैं कि एयर इंडिया की स्थापना अप्रैल 1932 में जेआरडी टाटा ने की थी। 1938 में इसे टाटा एयर सर्विसेज और बाद में इसे टाटा एयरलाइंस का नाम दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान टाटा एयरलाइंस ने रॉयल एयर फोर्स की सेना को आने-जाने, शरणार्थियों को बचाने में और विमानों की देखरेख में मदद की थी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद टाटा एयरलाइंस को कॉमर्शियल विमान के तौर पर स्थापित कर दिया गया और टाटा एयरलाइंस 29 जुलाई 1946 में पब्लिक लिमिटेड कंपनी बन गई। वहीं आजादी के बाद टाटा एयरलाइंस की 49 फीसदी हिस्सेदारी को सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया था। फोटो- ग्रेसगाइड

Humayun Tomb

3. जब गंदगी और बदबू से भर गया था हुमायूं का मकबरा

आप में से कई लोगों ने दिल्ली स्थित खूबसूरत हुमायूं का मकबरा देखा होगा, जिसे हुमायूं की पहली पत्नी बेगा बेगम के आदेश पर बनवाया गया था। इस मकबरे का निर्माण 1565 में शुरू हुआ था और यह 1572 में बनकर तैयार हुआ था। इसे बनवाने में कुल 15 लाख रुपए खर्च हुए थे। लेकिन देश के विभाजन के समय हजारों मुसलमानों को खुद की जान बचाने के लिए इसकी दीवारों के पीछे छिपना पड़ा। हालात उस वक्त इतने बदतर थे कि लोगों को मजबूरन यहीं पर शौंच करना पड़ता था। उस वक्त हालात ऐसे हो गए थे कि मकबरा परिसर में बने बाग में चारों तरफ मल-मूत्र भर गया था। चारों ओर गंदगी और बदबू का आलम था। आपको बता दें कि गंदगी को ढकने के लिए प्रशासन को यहां बालू डालनी पड़ी थी।

Buland Darwaza

4. बुलंद दरवाज़ा का एक और नाम

बुलंद दरवाजा का निर्माण 1602 में मुगल शासक अकबर ने करवाया था। जोकि फतेहपुर सीकरी के पास स्थित है। दरअसल जब अकबर ने 1573 में गुजरात पर जीत हासिल की थी उसी खुशी में इसका निर्माण कराया गया था। स्थानीय लोग इसे घोड़े की नाल का गेट भी कहते थे क्योंकि इसके लकड़ी के गेट पर घोड़े की नाल लगी है उसे भाग्यशाली माना जाता है।

KR MArket Bangalore

5. बेंगलुरु के केआर मार्केट की कहानी

बेंगलुरू के केआर मार्केट मार्केट के बनने की कहानी काफी दिलचस्प है। इसका निर्माण 1921 में हुआ था। इसकी वास्तुशैली कलकत्ता के सर स्टुअर्ट हॉग मार्केट से प्रेरित है। 1800 की शुरुआत में यहां पर कल्याणी झील थी, जहां पर लोग अपनी दुकानें लगाने लगे। यहां पर सब्जी वाले, फल वाले अपनी दुकानें लगाते थे। लेकिन 1914 में स्थानीय निकाय ने यहां पर मार्केट बनाने का फैसला लिया और केआर मार्केट अस्तित्व में आया।

Cubbon Park

6. कबन पार्क नहीं है बेंगलुरु का कबन पार्क

कर्नाटक राज्य में स्थित खूबसूरत शहर बेंगलुरु में कबन पार्क में बड़ी संख्या में पर्यटक घूमने के लिए आते हैं। पतझड़ के ठीक पहले यह पार्क फ्रांस या जर्मनी के पार्क से कम नहीं लगता है। दरअसल इस पार्क के नाम की कहानी एकदम अलग है। सबसे पहले इस पार्क का नाम 1870 में तत्कालीन मैसूर के कमिश्नर स जॉन मीड के नाम पर मीड पार्क रखा गया था। बाद में मैसूर के चीफ कमिश्नर सर मार्क कब्बन के नाम पर इसका नाम कब्बन पार्क रख दिया गया। 1927 में इस पार्क का नाम फिर बदला और इसे श्री चमराजेंद्र पार्क कर दिया गया था।

Writers Building

7. राइटर्स के लिए नहीं राइटर्स बिल्डिंग

कलकत्ता जो अब कोलकाता है वहां की पहली तीन मंजिला इमारत राइटर्स बिल्डिंग है। ब्रिटिश सरकार ने इसका निर्माण राइटर्स के रहने के लिए किया था, लेकिन आपको सुन कर ताज्‍जुब होगा कि यहां कभी राइटर्स (लेखक) कभी रहे ही नहीं। वो ऐसे कि ब्रिटिश अधिकारी अपने नौकरों को राइटर कह कर पुकारते थे और इस इमारत का निर्माण उन्‍हीं के लिए किया गया था। इस इमारत को बनने में 90 वर्ष लगे। इसका निर्माण 16090 में शुरू हुआ और 1780 में पूरा हुआ।

Calcutta Hotel

8. भारत का पहला होटल जो बिजली से हुआ था जगमग

कोलकाता में ईस्ट इंडिया कंपनी ने द ग्रेट इस्टर्न होटल का निर्माण 1840-41 में कराया था, जिसे अब द ललित ग्रेट ईस्टर्न होटल के नाम से जाना जाता है। इस होटल डेविड विल्सन ने ऑकलैंड होटल के तौर पर स्थापित किया था और तत्कालीन गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया जॉज ईडन के नाम पर रखा गया था। बाद में 1915 में इसका नाम ग्रेट ईस्टर्न होटल कर दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि यह देश का पहला होटल है जहां बिजली की रोशनी से पूरा होटल 1883 में जगमग हुआ था।

Opium Manufactuting

9. अंग्रेजों ने कैसे भारतीयों को लगाई अफीम की लत

वर्ष 1900 की शुरुआत में अफीम का व्यापार पूरे विश्‍व में चरम पर था। देखते ही देखते अफीम ब्रिटिश सरकार के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत बन गई। फिर क्या था। ब्रिटिश ने अफीम की खेती से लेकर मार्केटिंग तक के कार्यों में भारतीयों को लगा दिया। देखते ही देखते इस इंडस्‍ट्री में काम करने वाले तमाम लोगों को इसकी लत लग गई।

NSC Rates in 1947

10. 16 अगस्त 1947 को NSC की ब्याज दर

आज भारत के किसी भी डाक घर में जाकर आप नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट ले सकते हैं, जिसमें आपको 6.8 प्रतिशत की दर से ब्याज मिलेगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है जब भारत आज़ाद हुआ था तब NSC का रेट क्या रहा होगा। दरअसल जिस दिन भारत आज़ाद हुआ, उसके ठीक दूसरे दिन यानि कि 16 अगस्त 1947 को एनएससी की नई ब्याज दर लागू की गई थीं, जो थीं 3.5 प्रतिशत प्रति वर्ष। उस दौरान 5 रुपए, 10 रुपए, 50 रुपए और 100 रुपए के एनएससी सर्टिफिकेट जारी किये जाते थे। उस दौरान 10 रुपए का सर्टिफिकेट 12 साल में 15 रुपए का हो जाता था। एनएससी बोर्ड की स्थापना द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान आर्थिक स्‍टेबिलिटी लाने के लिए की गई थी। जनता के द्वारा किये गये निवेश का इस्तेमाल सरकार युद्ध के लिए धन जुटाने के लिए करती थी।

Read This article in English- These 10 Pre-Independence Era Stories of India Will Amaze You

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