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रक्षा बंधन के अनोखे रिवाज : कहीं भाईयों को दिया जाता है मरने का श्राप तो कहीं होती है भाई-बहन की पूजा

भाई-बहनों के प्यार और आपसी मीठी नोकझोंक की प्रतीक रक्षा बंधन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इस साल रक्षा बंधन 19 अगस्त को मनाया जाएगा। रक्षा बंधन को लेकर आमतौर पर देशभर में एक समान ही नियम होते हैं, जिसमें बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और बदले में भाई पूरा जीवन अपनी बहनों की रक्षा करने का वचन देते हैं।

लेकिन हमारे देश में रक्षा बंधन को लेकर कुछ जगहों पर बड़े अनोखे रिवाज मनाएं जाते हैं, जिन्हें अपवाद कहा जा सकता है।

raksha bandhan

आइए ऐसे कुछ अनोखे रिवाजों पर एक नजर डाल लेते हैं :

भाईयों को दिया जाता है मरने का श्राप

रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाई को राखी बांधकर अपनी रक्षा करने का वचन लेने के साथ-साथ उनकी आरती उतारकर भाईयों की लंबी आयु की कामना भी करती हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में एक जगह ऐसा भी है, जहां बहनें अपने भाईयों को मरने का श्राप देती है।

दरअसल, छत्तीसगढ़ के जशपुर में राखी और भाई दूज पर बहनें एक रिवाज के तहत पहले अपने भाई को मरने का श्राप देती हैं और बाद में अपनी जीभ पर कांटा चुभा कर उसका प्रायश्चित भी करती हैं। कहा जाता है कि भाईयों को दिया जाने वाला यह श्राप यमराज से उनकी रक्षा के लिए ही दिया जाता है। लोक कहानियों के मुताबिक यमराज ऐसे भाईयों को लेने आते हैं जिनकी बहनों ने उन्हें कभी श्राप नहीं दिया था।

मारवाड़ी समाज 9 दिनों तक मनाता है राखी

रक्षाबंधन को मारवाड़ी समाज में एक त्योहार के रूप में 9 दिनों तक मनाया जाता है। इस पर्व के सबसे पहले दिन घर के चौखट की पूजा की जाती है। उसके बाद मुख्य द्वार पर खीर-पुरी, मौली और दूर्वा रखी जाती है। फिर अगले 8 दिनों तक लोग रिश्तेदारों के घर जाते और रक्षाबंधन का त्योहार मनाते हैं। इसके बाद 9वें दिन गुगा जी का निर्माण किया जाता है, जिन्हें सारी राखियां उतारकर भेंट की जाती हैं। तब तक सभी भाई अपनी बहनों द्वारा बांधी गयी राखियां हाथों में ही बांधे रहते हैं।

unique tradition of raksha bandhan

खेला जाता है बग्वाल

उत्तराखंड में अल्मोड़ा से करीब 75 किमी की दूरी पर देवीधुरा मंदिर में प्राचीन काल से ही रक्षाबंधन के दिन बग्वाल खेलने की प्रथा का पालन किया जाता है। यह मंदिर चंपावत में मौजूद है। इस दौरान लोग फलों और पत्थरों से एक-दूसरे को मारते हैं। यह खेल लाखों लोगों की मौजूदगी में खेला जाता है। हालांकि बग्वाल खेलने के दौरान काफी संख्या में लोग घायल भी हो जाते हैं, लेकिन इसे खेलने व देखने के लिए पहुंचने वाले लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं आती है।

भाई-बहनों का मंदिर

बिहार के सिवान में एक ऐसा मंदिर है जहां न तो किसी भगवान की मूर्ति है और न तस्वीर। इसके बावजूद इस मंदिर में लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। भाई-बहन के प्रेम को समर्पित यह मंदिर भैया-बहिनी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर में बहने मिट्टी का पिंड बनाकर उसकी पूजा करती हैं और मंदिर के बाहर मौजूद बरगद के जुड़वा पेड़ों की पूजा कर अपने भाईयों की सलामती और लंबी आयु की पूजा करती हैं।

कहा जाता है कि मुगल काल में दो भाई-बहन इस जगह से गुजर रहे थे, तब उनपर डाकुओं ने हमला बोल दिया था। खुद को बचाने के लिए दोनों भाई-बहनों ने मिट्टी में समाधि ले ली थी और कालांतर में उनकी समाधि पर बरगद के दो पेड़ उग गये थे, जो आपस में जुड़ गये थे। इन्हीं पेड़ों की अब पूजा की जाती है।

इसके अलावा बड़ा चार धाम का हिस्सा पूरी का जगन्नाथ मंदिर भी भाई-बहन प्रेम का प्रतीक है। इस मंदिर में मुख्य रूप से भगवान जगन्नाथ की पूजा की जाती है लेकिन यहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। रथ यात्रा हो या स्नान यात्रा अथवा एकांतवास, हर मौके पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई-बहन भी जरूर साथ में होते हैं।

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