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सिन्दूर खेला : विजयादशमी पर क्यों महिलाएं खेलती हैं सिन्दूर से होली, जानिए कारण और क्या है इतिहास!

विजयादशमी, यानी जिस दिन मां दुर्गा अपना मायका (धरती) को छोड़कर वापस अपने ससुराल कैलाश पर्वत की ओर चल पड़ती हैं। कोलकाता और पश्चिम बंगाल के दूसरे शहरों में दुर्गा पूजा को सिर्फ एक त्योहार या उत्सव के तौर पर नहीं मनाया जाता है बल्कि यहां लोग इस त्योहार से भावनात्मक रूप से भी जुड़े होते हैं। साल के शुरुआत में ही बंगालवासी सबसे पहले जिस तारीख को ढूंढते हैं वह है 'दुर्गा पूजा कब से शुरू हो रही है'।

और विजयादशमी इसका ही एक और साल का इंतजार दर्शाता है। विजयादशमी के दिन लोग एक-दूसरे को गले लगाते, मिठाईयां खिलाते और शुभकामनाएं देते नजर आते हैं। लेकिन इस दिन जो चीज सबसे ज्यादा आकर्षित करती है वह है महिलाओं का होली खेलना।

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जी हां, विजयादशमी के दिन पश्चिम बंगाल में महिलाएं होली खेलती हैं लेकिन यह कोई आम होली नहीं बल्कि सिन्दूर से खेली जाने वाली होली होती है जिसे 'सिन्दूर खेला' कहा जाता है। इस साल कोलकाता में जहां इक्का-दुक्का पुरानी दुर्गा पूजा समितियां और जमींदार परिवारों में 12 अक्तूबर को सिन्दूर खेला का आयोजन किया गया है वहीं 95 प्रतिशत दुर्गा पूजा कमेटियां कल यानी 13 अक्तूबर को सिन्दूर खेला का आयोजन करेंगी। पर क्यों महिलाएं विजयादशमी के दिन एक-दूसरे को सिन्दूर लगाकर उसकी होली खेलती हैं? क्या है इस परंपरा के पीछे का इतिहास?

क्या है पौराणिक मान्यताएं?

महिलाएं विजयादशमी के दिन जो सिन्दूर खेला करती हैं, उसकी पौराणिक मान्यता भी है। हिंदू धर्म की मान्यताओं में कहा जाता है कि सिन्दूर भगवान ब्रह्मा का प्रतीक है। जिस प्रकार भगवान ब्रह्मा सभी कष्टों को दूर कर जीवन को आनंद से भर देते हैं, ठीक उसी तरह से हिंदू धर्म में माना जाता है कि अगर किसी महिला या युवती की मांग में सिन्दूर भरा जाता है तो उसकी किस्मत में भी भगवान ब्रह्मा खुशियां लिख देते हैं।

इसी वजह से विजयादशमी के दिन महिलाएं एक-दूसरे की मांग में सिन्दूर लगाने के साथ-साथ एक-दूसरे के गालों पर भी ढेर सारा सिन्दूर लगाती हैं ताकि उनका जीवन खुशियों से भरा रहे। यह एक प्रकार से सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

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विजयादशमी पर देवी दुर्गा को लगाया जाता है सिन्दूर

बंगाली संस्कृति की मान्यताओं के अनुसार दुर्गा पूजा के समय मां दुर्गा अपने ससुराल (कैलाश) से कुछ दिनों के लिए धरती पर अपने मायके आती हैं। एक साल के इंतजार के बाद घर आयी बेटी को सिर्फ शाकाहारी भोजन कैसे खिलाया जाए, यहीं सोचकर दुर्गा पूजा के समय भी बंगाली परिवारों में मांसाहार का प्रचलन है। क्योंकि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा व्रत-त्योहार का नहीं बल्कि बेटी के घर आने की खुशियां मनाने का उत्सव होता है।

ठीक उसी प्रकार विजयादशमी के दिन देवी दुर्गा अपने मायके से वापस अपने ससुराल जाती हैं। इसलिए इस दिन महिलाएं घर की बेटी का मुंह मीठा कर, उन्हें सिन्दूर लगाकर उनसे अपने पति की लंबी आयु और बच्चों व परिवार की भलाई का आर्शिवाद मांगती हैं।

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कब से शुरू हुआ था सिन्दूर खेला?

सिन्दूर खेला की शुरुआत कब से हुई थी, इस बारे में कोई सटिक तथ्य नहीं है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में लगाये गये अनुमान के अनुसार लगभग 200 सालों पहले जमींदार परिवारों में इसकी शुरुआत हुई थी। उस समय कहा जाता था कि जो महिला सिन्दूर खेला में हिस्सा लेगी वह कभी विधवा नहीं होगी। यह एक प्रकार से एक महिला का अपने परिवार और पति की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की शक्ति को दर्शाता है।

सिन्दूर खेला के समय महिलाएं अपनी साड़ियों के खराब होने की चिंता किये बगैर बहुत ही सुन्दर तरीके से तैयार भी होती हैं और खुद को ढेर सारे गहनों से सजाती भी हैं। मां दुर्गा को पहले मिठाई खिलाकर और सिन्दूर लगाकर लाड़ लड़ाया जाता है, उसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिन्दूर लगाकर विजयादशमी की बधाईयां देती हैं।

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