पिछले कई सालों से नदियों में बाढ़ आने, अत्यधिक बारिश होने या गर्मी बढ़ने की समस्याओं को लेकर पर्यावरणविदों को चिंता जताते हुए आपने जरूर सुना होगा। और अधिकांश समय बाढ़ या अत्यधिक बारिश आदि प्राकृतिक आपदाओं की वजह ग्लोबल वॉर्मिंग को माना जाता है। दावा किया जाता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से मौसम के सामान्य से ज्यादा गर्म होने के साथ-साथ ग्लेशियर भी लगातार पिघल रहे हैं।
21 मार्च 2025 को यूनाइटेड देशों (United Nations) ने अंतरराष्ट्रीय ग्लेशियर रक्षा वर्ष (International Year of Glacier's Preservation) के तहत पहला ग्लेशियर दिवस (World Day for Glaciers) मनाया। इस मौके पर UNESCO की तरफ से एक रिपोर्ट जारी की गयी है जिसमें जल संरक्षण के लिए ग्लेशियरों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।

इस रिपोर्ट में ग्लेशियरों के लगातार पिघलने की वजह से विश्व को भविष्य में जिन प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, उनके बारे में चौंकाने वाले खुलासे किये गये हैं।
दुनिया की एक-तिहाई जनसंख्या एशियाई नदियों पर निर्भर
एशिया के पर्वतीय इलाकों में ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे ज्यादा बर्फ पाया जाता है, जो इसे तीसरा ध्रुव बनाता है। एशियाई पर्वतीय क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बर्फ हिमालय और काराकोरम पर्वतों पर ही मिलता है। बताया जाता है कि एशिया की 10 प्रमुख नदियां, जिसमें गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी भी शामिल हैं, ये हिंदु कुश हिमालय से ही निकलती हैं।
दुनिया की लगभग एक-तिहाई जनसंख्या जलापूर्ति के लिए इन सभी एशियाई नदियों पर ही निर्भर बतायी जाती है। मौसमी तौर पर हर साल ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली पानी से लगभग 220 मिलियन लोगों की जरूरतें पूरी होती हैं। इसके साथ ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिज़स्तान जैसे देशों भी अपनी औद्योगिक जरूरतों को इन नदियों के पानी से ही पूरा करते हैं।

ग्लेशियरों के पिघलने से ही बढ़ी है बाढ़ की समस्या
UNESCO की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले कुछ दशकों में एशियाई देशों, खासतौर पर ऊपरी सिंधु और गंगा की घाटी में आने वाली भयावह बाढ़ की मुख्य वजह ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना ही है। संभावना जतायी जा रही है कि ग्लेशियर जितनी तेजी से पिघल रहे हैं, भविष्य में स्थिति और भी बिगड़ सकती है।
बताया जाता है कि ग्लेशियरों के पिघलने की मात्रा में हुई वृद्धि और अत्यधिक बारिश के संयुक्त कारण से 50 साल बाद, सदी के अंत तक ऊपरी सिंधु घाटी में आने वाली बाढ़ में 51%, ऊपरी ब्रह्मपुत्र की घाटी में 80% और ऊपरी गंगा की घाटी में 108% तक बाढ़ की संभावनाओं में वृद्धि हो सकती है। साथ ही इस रिपोर्ट में यह आशंका भी जतायी गयी है कि हिमालयी क्षेत्रों में अगले कुछ दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की मात्रा में काफी वृद्धि हो सकती है, जिससे नदियों में भी जलस्तर तेजी से बढ़ेगा।
ग्लेशियरों के पिघलने से आएगा सुखा
इस रिपोर्ट के अनुसार अगले कुछ दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति में तेजी आने की आशंका जतायी गयी है। साथ ही यह भी आशंका जतायी गयी है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह से दुनिया भर में कुछ ऐसी जगहें जहां जनसंख्या का घनत्व काफी ज्यादा है, वहां बाढ़ की संभावनाएं तो बढ़ेंगी। साथ ही कई ऐसी जगहें भी होंगी जहां सूखा पड़ सकता है। इस वजह से कृषि कार्यों में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
खासतौर पर सदी के बीच में उत्तर भारत की नदियों में जलस्तर के कम होने की आशंका पैदा हो रही है, जिस वजह से सिंचाई, कृषि कार्यों के साथ ही जलशक्ति पर भी बुरा असर पड़ सकता है। बता दें, हमारे देश की लगभग 52% जलशक्ति हिमालय से निकलने वाली नदियों से ही पैदा की जाती है।

ग्लेशियरों का टूटना और असामान्य रूप से पिघलना कितना भयावह हो सकता है, यह हमने साल 2013 में ही देख लिया था जब चोराबारी ग्लेशियर के पिघलने और अचानक बादल फटने की वजह से हुई बारिश के कारण केदारनाथ में भयावह बाढ़ आयी थी। उस बाढ़ में केदारनाथ मंदिर परिसर के आसपास का पूरा क्षेत्र बह गया था।
इस बाढ़ में करीब 6000 लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी, 30 हाईड्रोपावर प्लांट पूरी तरह से या आंशिक रूप से बर्बाद हुए थे और न जाने कितनी सड़कें व ब्रिज तबाह हो गयी थी। ऐसी ही स्थिति साल 2023 में सिक्किम के कैटेस्ट्रोफिक ग्लेशियर लेक में अचानक आयी बाढ़ के बाद भी उत्पन्न हुई थी जब तीस्ता III हाईड्रोइलेक्ट्रिक डैम नष्ट हो गया था और लगभग 100 लोग या तो गायब हुए अथवा मारे गये। इस बाढ़ ने भी हजारों जिंदगियों को प्रभावित किया था।



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