सोमवार देर रात अलकनंदा के किनारे चल रहे उत्खनन कार्य के कारण बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई, जिससे बद्रीनाथ मंदिर के पास श्रद्धालुओं में दहशत फैल गई। पानी ने कुछ समय के लिए ब्रह्मकपाल को जलमग्न कर दिया और तप्तकुंड की सीमा तक पहुंच गया। अलकनंदा नदी हिमालयी मंदिर के ठीक नीचे बहती है और नदी और मंदिर के बीच तप्तकुंड है, जो औषधीय गुणों वाले गर्म सल्फर झरनों का एक समूह है।
मंदिर में जाने से पहले श्रद्धालु यहां स्नान करते हैं। वहीं ब्रह्मकपाल अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है, जहां पूर्वजों की याद में तर्पण किया जाता है।

इस दौरान मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि नदी की तेज धारा ने श्रद्धालुओं को डरा दिया था। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, जल स्तर में अचानक वृद्धि ने बद्रीनाथ मास्टर प्लान के तहत चल रही खुदाई के कारण नदी के किनारों पर जमा मलबे को बहा दिया। तीर्थ-पुरोहित संघ के अध्यक्ष प्रवीण ध्यानी ने कहा कि उन्होंने स्थानीय प्रशासन से लंबे समय से मास्टर प्लान के तहत निर्माण कार्य से उत्पन्न संभावित खतरों को दूर करने का अनुरोध किया था।
ध्यानी ने दावा किया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जिला मजिस्ट्रेट से भी दो बार अनुरोध किया। साथ ही उन्होंने आरोप भी लगाया कि इसके बावजूद इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया।
पहली बार बढ़ा अलकनंदा का इतना जलस्तर
प्रवीण ध्यानी, जो पिछले 40 वर्षों से इस संगठन से जुड़े हैं, ने कहा कि उन्होंने पहली बार अलकनंदा के जलस्तर में इतनी वृद्धि देखी है। उन्होंने बताया कि खुदाई से निकला मलबा अलकनंदा में डाला जा रहा है, जिससे इसका प्रवाह क्षेत्र कम हो रहा है। सोमवार शाम को ब्रह्मकपाल में चार पवित्र चट्टानें जल स्तर बढ़ने से डूब गईं। ध्यानी ने चेतावनी दी कि ब्रह्मकपाल और तप्तकुंड तक पहुंचने वाला पानी बद्रीनाथ मंदिर के लिए भी खतरा बन सकता है।

पर्यावरणविद् की चिंता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट- बद्रीनाथ आध्यात्मिक नगर मास्टर प्लान कार्यक्रम के तहत तीन साल से इस क्षेत्र में बुलडोजर चल रहे हैं। अलकनंदा के किनारों पर खुदाई के कारण नदी के किनारों पर मलबा जमा हो गया है।
पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने दो साल पहले ही पीएम मोदी को लिखे पत्र में बद्रीनाथ धाम के मास्टर प्लान के तहत "विचारहीन" निर्माण के बारे में चिंता व्यक्त की थी। भट्ट ने इस बात पर जोर दिया कि उच्च हिमालय में होने वाली गतिविधियां सीधे तौर पर अलकनंदा जैसी ग्लेशियर-पोषित नदियों को प्रभावित करती हैं।
बता दें, 1930 और 2014 में भी बद्रीनाथ मंदिर के पास अलकनंदा का जलस्तर काफी बढ़ गया था। भट्ट ने बद्रीनाथ आध्यात्मिक नगर के निर्माण के मास्टरप्लान के तहत कोई भी कार्यक्रम शुरू करने से पहले नदियों के चरित्र, भूगोल और मौसम के प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण करने का आग्रह किया।
चमोली जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंद किशोर जोशी ने पुष्टि की कि नदी के बढ़ते जलस्तर के बारे में सोमवार शाम को अलर्ट जारी किया गया था, लेकिन अभी तक कोई नुकसान की सूचना नहीं दी गई है।



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