रजस्वला या फिर मासिक धर्म...। महिलाओं के जीवन से जुड़ा ऐसा सच भारत में जिसे लेकर उन्हें सार्वजनिक तौर पर बात करने की भी अनुमति नहीं होती है। लेकिन भारत के ही असम के गुवाहाटी में मौजूद शक्तिपीठ देवी कामाख्या ना सिर्फ रजस्वला होती हैं बल्कि उस समय को मंदिर में एक उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

हर साल जून में मानसून के समय असम के कामाख्या देवी मंदिर में अम्बूबाची उत्सव मनाया जाता है जिसका धार्मिक महत्व भी है।
आइए आपको कामाख्या देवी के रजस्वला होने की कहानी और अम्बूबाची के बारे में बताते हैं :
हर साल 3 दिन के लिए देवी होती हैं रजस्वला

असम की राजधानी गुवाहाटी में स्थित शक्तिपीठ कामाख्या में देवी हर साल 5 दिनों के लिए रजस्वला होती हैं। इन 3 दिनों के लिए मंदिर परिसर को बंद कर दिया जाता है। लेकिन अम्बूबाची उत्सव में शामिल होने के लिए गुवाहाटी में देश-विदेश से आने वाले भक्तों की संख्या में कोई कमी नहीं आती है। इस दौरान मंदिर में अम्बूबाची मेले का भी आयोजन किया जाता है। दुनिया भर में संभवतः कामाख्या एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां योनि की पूजा करने का विधान है। जी हां, कामाख्या मंदिर में देवी की किसी मूर्ति नहीं बल्कि योनि की पूजा की जाती है।
क्यों होती है योनि की पूजा
गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है। यहां देवी सती की योनि की पूजा की जाती है। प्रजापति दक्ष के यज्ञ में पति शिव के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाने की वजह से देवी सती ने अपनी योगशक्ति के बल पर आत्मदाह कर लिया था। जब उनकी मृत्यु की जानकारी भगवान शिव को मिली, तो गुस्से और दुःख में वह देवी सती के मृत शरीर को लेकर तांडव नृत्य करने लगे।

उस समय उनके तांडव को रोकने के लिए भगवान विष्णु आगे आए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया। यहीं 51 हिस्से जहां गिरे उन्हें आज शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि कामाख्या मंदिर में देवी सती की योनि गिरी थी, जिसकी आज भी पूजा की जाती है।
प्रसाद में मिलता है लाल कपड़ा
मानसून के समय जब असमीया माह अहर चलता है, उस समय 22 जून से 3 दिनों के लिए कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं। इस समय मंदिर को बंद कर दिया जाता है, जिसमें भक्तों का प्रवेश निषेध होता है। मंदिर को बंद करने से पहले देवी की योनि स्वरूप प्रतिमा के चारों तरफ सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है। 3 दिन बाद मंदिर को खोला जाता है। चौथे दिन मंदिर खुलने के बाद ही भक्तों को देवी के दर्शन करने की अनुमति दी जाती है।

जब मंदिर खुलता है तो उस समय वह कपड़ा लाल मिलता है। कहा जाता है कि यह कपड़ा मां सती के रज यानी रक्त से लाल हो गया है। इस कपड़े को अम्बूबाची वस्त्र कहा जाता है। इसी कपड़े को प्रसाद स्वरूप भक्तों में वितरित किया जाता है। अम्बूबाची उत्सव में शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से भक्त इस समय कामाख्या पहुंचते हैं।
चुनाव में जीत का मिलता है आशिर्वाद

कहा जाता है कि कामाख्या देवी अपने किसी भी भक्त को खाली हाथ नहीं लौटाती हैं। यहां आकर उनके दर्शन करने वाले हर भक्त की मनोकामना जरूर पूरी होती है। कामाख्या देवी मंदिर में कोर्ट-कचहरी से लेकर चुनाव में जीत तक का आर्शिवाद मिलता है। यहीं वजह है कि कोर्ट-कचहरी के जटिल पेंच में फंसे लोगों के साथ-साथ देश के कोने-कोने से राजनेता भी चुनाव से पहले मां कामाख्या को चुनरी चढ़ाने और उनके दर्शन करने के लिए असम आते रहते हैं।



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