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भारत के किस राजा की वजह से आज श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, ग्रीस में हैं बौद्ध धर्म के करोड़ों अनुयायी?

बौद्ध धर्म का इतिहास गौतम बुद्ध से शुरू होता है। उनकी शिक्षाओं के आधार पर ही बौद्ध धर्म की नींव पड़ी और अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ी। लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल) में जन्मे गौतम बुद्ध ने शिक्षा बिहार के बोधगया में पायी। लेकिन आज बौद्ध धर्म को मानने वाले और इसके करोड़ों अनुयायी नेपाल व भारत के अलावा श्रीलंका, थाईलैंड, ग्रीस, चीन, जापान, कोरिया और ना जाने विश्व के कितने देशों में फैले हुए हैं।

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आखिर भारत से इस धर्म का प्रचार-प्रसार दूसरे देशों में कैसे हुआ? बौद्ध धर्म को भारत के बाहर दूसरे देशों तक पहुंचाने का श्रेय भारत के ही एक महान सम्राट को जाता है। आज हम आपको उस भारतीय राजा के बारे में बता रहे हैं जिनकी वजह से बौद्ध धर्म भारत के बाहर दूसरे देशों तक पहुंचा।

सिद्धार्थ कैसे बने गौतम बुद्ध

शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन और रानी महामाया के घर ईसा पूर्व 563 में उनके पुत्र सिद्धार्थ जन्म हुआ। चुंकि सिद्धार्थ का जन्म गौतम गोत्र में हुआ था, इसलिए वह गौतम कहलाए। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार सिद्धार्थ के जन्म के 7 दिनों बाद उनका माता महामाया चल बसी और उनका पालन-पोषण उनकी मौसी व राजा शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया। सिद्धार्थ बचपन से ही काफी करुणामय थे। 16 साल की उम्र में उनका विवाह यशोधरा से हुआ। इसके बाद उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ

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लेकिन विवाह के बाद ही उनका मन वैराग्य में चला गया और उन्होंने परिवार का त्याग कर सन्यास अपना लिया। सन्यास काल के दौरान 35 वर्ष की आयु में बिहार के बोधगया (वर्तमान राजधानी पटना के पास) में वैशाख पूर्णिमा के दिन पीपल के एक वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान (बोधी) की प्राप्ति हुई। इसलिए पीपल का वह वृक्ष बोधीवृक्ष कहलाया और वह स्थान बोधगया। ईसा पूर्व 483 में 80 साल की आयु में उन्होंने महापरिनिर्वाण ग्रहण किया।

इस भारतीय सम्राट ने किया बौद्ध धर्म का प्रचार

भारत और भारत के बाहर बौद्ध धर्म का प्रचार व प्रसार करने का श्रेय चक्रवर्ती सम्राट अशोक को जाता है। अशोक मौर्यवंश के प्रतापी सम्राट थे, जिनका साम्राज्य वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार के अधिकांश भूभाग पर था। अशोक का साम्राज्य मगध और उनकी राजधानी पाट्लीपुत्र (वर्तमान पटना) थी। अशोक को चक्रवर्ती सम्राट कहा जाता था जिसका अर्थ हुआ सम्राटों के सम्राट। अशोक एक चक्रवर्ती सम्राट होने के साथ-साथ महान योद्धा भी थे।

samrat ashoka

उनके समय में ही 23 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी थी जिसमें तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला प्रमुख हैं। अशोक ने अपने साम्राज्य का विस्तार सत्ता संभालने के महज 8 वर्षों के दौरान ही कर लिया था। उनका युद्ध कौशल इतना प्रसिद्ध था कि जब अशोक के सौतेले भाई सुशीम के अकुशल प्रशासन के कारण तक्षशिला में विद्रोह पनप उठा तब उनके पिता बिन्दुसार ने विद्रोह का दमन करने के लिए राजकुमार अशोक को वहां भेजा। अशोक के आने की खबर सुनते ही विद्रोही बिना किसी युद्ध के शांत हो गये।

अशोक कैसे बौद्ध धर्म से हुए प्रभावित

अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष में सम्राट अशोक ने कलिंग (वर्तमान ओडिशा, बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा) पर आक्रमण कर दिया। इतिहासकारों के मुताबिक इस युद्ध में 1 लाख 50 हजार व्यक्तियों को बंदी, 1 लाख लोगों की हत्या और 1.5 लाख लोग घायल हुए थे। इतने बड़े नरसंहार को देखकर सम्राट अशोक इतने ज्यादा विचलित हो गये कि उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाने का फैसला कर लिया। बता दें, कलिंग युद्ध से 2 साल पहले ही अशोक गौतम बुद्ध के संपर्क में आ चुके थे।

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कलिंग के युद्ध ने ही चक्रवर्ती सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन किया और उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। अशोक ने ना सिर्फ बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार भारत में किया बल्कि उन्होंने 9 बौद्ध अनुयायियों को दुनिया के अलग-अलग कोनों में भी भेजा जिससे बौद्ध धर्म भारत के बाहर दूसरे देशों में भी फैला। इस कार्य में अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को भी शामिल किया।

9 संघियों को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा

संघी का नाम देश का नाम
मजझंतिका/महयंतीका कश्मीर और गांधार
महादेवा थेरा महिष्मंडला (मैसूर)
रक्षीता थेरा वनवासी (उत्तरी कन्नड़ और दक्षिण भारत)
योना धम्मरक्षीता अपनांतका (उत्तरी गुजरात काठियावाड़, कच्च और सिंध)
महाधम्मरक्षिता महारत्था (महाराष्ट्र)
महारक्षिता योना ग्रीस
मजझीमा हिमावंता हिमालयी क्षेत्र
सोना व उत्तर सुवर्णाभूमी म्यांमार/थाईलैंड
महेंद्र और संघमित्रा (अशोक के पुत्र व पुत्री) लक्षद्वीप और श्रीलंका

इस तरह संघियों के हाथों बौद्ध धर्म भारत या चक्रवर्ती सम्राट अशोक के साम्राज्य की सीमाओं को लांघकर ग्रीस, म्यांमार, थाईलैंड और श्रीलंका में पहुंचा जहां आज भी इस धर्म को मानने वाले अनुयायियों की संख्या करोड़ों में है।

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