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'देवों के घर' देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम की कहानी

देवताओं के घर में स्थित है बैद्यनाथ मंदिर। 'देवताओं का घर' यानी झारखंड के देवघर में स्थित है बैद्यनाथ मंदिर। देवघर नाम से पता चल रहा है की इसका मतलब है 'देवताओं का घर'।बैद्यनाथ मंदिर को बाबा बैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। बता दें ज्योतिर्लिंगों को शिव जी का पवित्र निवास माना जाता है।

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बैद्यनाथ मंदिर का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों के साथ-साथ वर्तमान गाथाओं में भी मिलता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ इसे हिंदू पौराणिक कथाओं में पवित्र 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।साथ ही मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वंय भगवान विष्णु ने की थी. कहा जाता है की मंदिर में आने वाले सभी भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इसलिए यहां के शिवलिंग को कामना लिंग भी कहा जाता है.

बाबा बैद्यनाथ का इतिहास

हिंदू पौराणिक कहानियों के अनुसार, लंका राज रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। एक बार रावण को लगा कि उनकी राजधानी अधूरी रहेगी जब तक भगवान शिव हमेशा के लिए वहां रहने का फैसला नहीं करते। इसलिए, वह भगवान को प्रभावित करने के लिए हिमालय गए और एक के बाद एक अपने सिर चढ़ाने लगें।

जब वे अपना दसवां सिर काटने वाले थे, तब शिव जी रावण से प्रसन्न होकर धरती पर अवतरित हुए और रावण को ठीक किया। यहां शिव जी ने चिकित्सक जैसा काम किया इसलिए उन्हें 'वैद्य' कहा जाता है। वैद्य मतलब 'चिकित्सक' और इसलिए मंदिर का नाम बैद्यनाथ मंदिर पड़ा। फिर उन्होंने रावण को वरदान दिया की वे जो चाहे मांग सकता है। तब रावण ने शिव जी से कहा कि वह शिवलिंग को अपने साथ लंका ले जाने की अनुमति दें, जिस पर भगवान सहमत हो गए लेकिन शिव जी ने एक शर्त रखी। शिव जी ने रावण से कहा की जब तक वे लंका नहीं पहुंच जाते, तब तक वह शिवलिंग को जमीन पर न रखें वरना शिवलिंग जमीन में जम जाएगा और रावण इसे कभी भी उखाड़ नहीं पाएगा। रावण ने शर्त मान ली और यात्रा शुरू कर दी।

वहीं दूसरी तरफ बाकी सभी देवी-देवता शिव जी के इस फैसले से खुश नहीं थे क्योंकि वे जानते थे, की अगर शिव जी रावण के साथ लंका गए, तो रावण अमर हो जाएंगे और उनके बुरे कर्मों से दुनिया को खतरा होगा।
इसलिए सभी देवी-देवता भगवान विष्णु से रावण के शिवलिंग को लंका ले जाने से रोकने का आग्रह किया।

तब श्री हरि विष्णु ने वरुणदेव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने को कहा। वहीं जब रावण ने आचमन करके शिवलिंग को लेकर लंका की ओर अपनी यात्रा शुरू खी तो देवघर के पास रावण को लघुशंका लग गई। तब रावण ने आसपास देखा पर आसपास कोई नहीं था जिसे रावण शिवलिंग पकड़ा सके। कुछ देर बाद रावण को एक ग्वाला दिखा। कहा जाता है की उस ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु थें। रावण ने ग्वाले से कहा कि वह शिवलिंग को तब तक पकड़ कर रखें जब तक रावण लघुशंका से वापस न आ जाए। साथ ही साथ रावण ने यह भी कहा की वह शिवलिंग को गल्ती से भी जमीन पर न रखें।

जब रावण लघुशंका करने गया तो लघुशंका से एक तालाब बन गया। लेकिन रावण की लघुशंका नहीं खत्म नहीं हुई। दूसरी तरफ ग्वाले ने रावण से कहा कि बहुत देर हो गई है और अब वह शिवलिंग उठाये खड़ा नहीं रह सकता। ग्वाले ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। वहीं शिवलिंग के जमीन पर रखते ही रावण की लघुशंका भी खत्म हो गई। जब रावण लौट कर आया तो उसने बहुत कोशिश की लेकिन शिवलिंग को उठा नहीं पाया। तब उसे भगवान की लीला समझ में आ गई। इसके बाद रावण क्रोधित हो गया और शिवलिंग पर अंगूठा दबाकर वहां से चला गया।

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रावण ने शिवलिंग को क्षतिग्रस्त कर दिया। फिर सभी देवी-देवताओं ने धरती पर आकर शिवलिंग की स्थापना की। बता दें मंदिर परिसर में एक तालाब है जिसे वह स्थान माना जाता है जहां रावण ने लघुशंका की थी। यहां के शिवलिंग को 'कामना लिंग' भी कहा जाता है क्योंकि शिव जी ने रावण को इच्छा दी थी। और कामना का मतलब 'इच्छा' होता है।

बैद्यनाथ धाम भारत का इकलौता स्थान है जो ज्योतिर्लिंग और शक्ति पीठ दोनों है। ऐसा माना जाता है कि सती का दिल बैद्यनाथ धाम पर गिरा जब भगवान विष्णु ने शिव जी के विनाश को रोकने के लिए सती की लाश को काटने के लिए सुदर्शन चक्र चलाया था।माता पार्वती का मंदिर शिवजी के मुख्य मंदिर के बगल में है, जो लाल धागे से बंधा है।

मंदिर तीन भागों में बंटा हुआ है, प्रवेश द्वार, मध्य भाग और मुख्य मंदिर। मंदिर 72 फीट ऊंचा है, जिसका मुख पूर्व की तरफ है और कमल जैसा दिखता है। मंदिर के उपर तीन सोने के बर्तन हैं जो गिधौर के महाराजा राजा पूरन सिंह द्वारा दान किए गए थें। वहीं जहाजों के साथ एक 'पंचसुला' है, जो त्रिशूल के आकार में है। इसके अलावा एक आठ पंखुड़ियों वाला कमल का रत्न है, जिसे चंद्रकांता मणि के नाम से जाना जाता है।

बाबा बैद्यनाथ मंदिर का समय

मंदिर का दरवाजा सुबह 4:00 बजे खुलता है और दोपहर 3:30 बजे बंद जाता है। फिर शाम 6:00 बजे फिर से द्वार खोल दिए जाते हैं और रात 9:00 बजे बंद कर दिए जाते हैं।

बैद्यनाथ मंदिर के अलावा देवघर में और भी दर्शनीय स्थल

नौलखा मंदिर

नौलखा मंदिर अपने वास्तुशिल्प के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है। ये मंदिर राधा-कृष्ण को समर्पित है। नौलखा मंदिर का निर्माण एक संत द्वारा किया गया था। यह मंदिर 146 फीट ऊंचा है।

रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ

देवघर में स्थित यह रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ सबसे पुराना शैक्षणिक संस्थान है। इसकी स्‍थापना 1922 में की गई थी। अब यह पूरी तरह से वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय है। कहा जाता है की स्वामी विवेकानंद के कई शिष्यों द्वारा इस जगह का उपयोग किया जाता था।

मंदरा पर्वत

देवघर स्थित मंदार पर्वत आकर्षण का बड़ा केंद्र है। यह समुद्रतल से 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से अमृत निकालने के लिए इस पर्वत का इस्तेमाल किया गया था। इसलिए हिंदुओं के लिए ये बेहद पवित्र जगह है। इस पहाड़ पर एक मंदिर भी है जिसे 12वें जैन तीर्थंकर वासुपूज्य के लिए श्रद्धांजलि के रूप में बनाया गया था।

कैसे पहुंचे बाबा बैद्यनाथ धाम

फ्लाइट से-

देवघर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा शुरू हो गई है, जो देवघर शहर से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से आप मंदिर पहुंचने के लिए कैब कर सकते हैं।

ट्रेन से-

देवघर का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन देवघर जंक्शन है, जो देवघर शहर से 5 किलोमीटर दूर है। लेकिन आपको देवघर जंक्शन पहुंचने के लिए पहले रांची, बोकारो या धनबाद पहुंचना होगा, क्योंकि देवघर जंक्शन के लिए आपको यहीं से ट्रेन मिलेगी। फिर यहां आप मंदिर पहुंचने के लिए कैब कर सकते हैं।

सड़क मार्ग से-
देवघर के लिए आसपास के शहरों और कस्‍बों से बसें चलती हैं। ये सड़क मार्ग द्वारा भारत के अन्य प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

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