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उत्तराखंड के इस मंदिर में स्टाम्प पेपर पर लिख मांगा जाता है न्याय, सदियों से चली आ रही है परम्परा

वेदों में देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड अपने मंदिरों व खूबसूरती के लिए जाना जाता है। यहां कई ऐसे मंदिर है, जहां देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग दर्शन करने आते है। इसमें से ही एक है- चितई गोलू देवता मंदिर..., जो अल्मोड़ा जिले में स्थित है। वादियों की खूबसूरती में स्थापित ये मंदिर अपने रोचकता के लिए जाना जाता है। यहां चिट्ठी के माध्यम से भगवान से गुहार लगाई जाती है और मनोकामना पूरी हो जाने पर भक्त घंटा चढ़ाते हैं।

न्याय के लिए जाना जाता है चितई गोलू देवता मंदिर

अल्मोड़ा की खूबसूरती के बीच स्थित ये मंदिर अपनी सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। यह मंदिर न्याय के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में भक्त चिट्ठी के माध्यम से वरदान मांगते हैं। इतना ही नहीं, कई श्रद्धालु स्टाम्प पेपर पर लिख भगवान से न्याय की अपील करते हैं। इसीलिए इस मंदिर को लोग न्याय मंदिर के नाम से भी जानते हैं।

चितई गोलू देवता मंदिर

चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास

अल्मोड़ा से 8 किमी. की दूरी पर स्थित पिथौरागढ़ हाईवे पर न्याय के देवता कहे जाने वाले चितई गोलू देवता का मंदिर है, जिसे ग्वेल देवता के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के मुख्य देवता गोलू देवता है, जो घोड़े पर सवार होकर हाथ में धनुष बाण लिए हैं। इस मंदिर में हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं।

किवदंती के मुताबिक, गोलू देवता चंद राजा बाज बहादुर (शासनकाल - 1638- 78 ईस्वी) की सेना में जनरल थे, जिन्होंने एक युद्ध में लड़ाई करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। उन्हीं के सम्मान में चितई मंदिर की स्थापना की गई है, जिसे गोलू देवता मंदिर कहा जाता है। कहा ये भी जाता है कि 12वीं शाताब्दी में चंद वंश के सेनापति ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। हालांकि, ये मंदिर कब बना, कैसे बना या किसने बनवाया? इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। लेकिन मंदिर का वास्तविक स्वरूप 19वीं सदी के पहले दशक में बनकर तैयार हुआ है। न्याय के देवता का यह मंदिर उत्तराखंड में काफी प्रसिद्ध है। गोलू देवता को भगवान शिव व विष्णु दोनों का अवतार भी बताया जाता है।

चितई गोलू देवता मंदिर

घंटियों का मंदिर भी कहा जाता है..

गोलू देवता मंदिर में आप जैसे ही प्रवेश करेंगे, आपको हर ओर, हर कोने में कई घंटियां दिखाई देंगी। ये सभी घंटियां भक्तों द्वारा चढ़ाई गई है। इनकी संख्या कितनी है, ये आज तक पता नहीं चल पाया। इसीलिए इस मंदिर को 'घंटियों का मंदिर' भी कहा जाता है। यहां आसपास के नव- दम्पती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। कहा जाता है मंदिर में दर्शन के बाद इनका रिश्ता जन्मो-जन्मांतर के लिए हो जाता है।

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