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साल में सिर्फ 1 दिन रक्षाबंधन पर खुलते हैं उत्तराखंड के इस मंदिर के कपाट, क्यों है ऐसी अनोखी प्रथा?

उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी पुकारा जाता है। इस राज्य के हर एक पहाड़ पर कोई ना कोई मंदिर जरूर है जिसकी अपनी कोई कहानी भी है। ऐसा ही एक मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले के उर्गम घाटी में स्थित है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां साल के 364 दिन भक्त पूजा-अर्चना नहीं कर सकते हैं।

banshi narayan temple

जी हां, साल में सिर्फ 1 दिन इस मंदिर के कपाट खुलते हैं और भक्त अपने भगवान के दर्शन करने के साथ उनकी पूजा भी कर पाते हैं। उत्तराखंड में स्थित यह मंदिर है वंशी नारायण मंदिर, जिसके कपाट सिर्फ 1 दिन के लिए रक्षाबंधन के दिन ही खुलते हैं। पर ऐसा क्यों होता है कि भक्त साल के बाकी सभी दिन अपने भगवान का दर्शन करने से वंचित रह जाते है?

कहां है यह अनोखा मंदिर

lord vishnu

वंशी नारायण मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में उर्गम घाटी में स्थित है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर उत्तराखंड का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसके कपाट सालभर बंद रहते हैं और सिर्फ 1 दिन के लिए खोले जाते हैं। रक्षाबंधन के दिन सूर्योदय के साथ ही इस मंदिर के कपाट को भक्तों के लिए खोल दिया जाता है और सूर्यास्त के साथ ही अगले एक साल के लिए मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। यह अनोखा मंदिर पंच केदारों में से एक कल्पेश्वर महादेव के मंदिर से करीब 12 किमी और देवग्राम से 10 किमी की दूरी पर स्थित है।

सबसे ज्यादा उत्साहित होती महिलाएं

temple in uttarakhand

यूं तो भगवान की पूजा करने में कोई लिंगभेद नहीं होता है लेकिन वंशी नारायण मंदिर में पूजा करने के लिए पुरुषों की तुलना में महिलाएं व अविवाहित युवतियां काफी अधिक उत्साहित रहती हैं। रक्षा बंधन के दिन इस मंदिर के कपाट खुलते हैं, इसलिए महिलाएं व युवतियां भगवान विष्णु को राखी बांधती हैं और अपने भविष्य तथा परिवार की मंगल कामना करती हैं। मंदिर में उर्गम घाटी के साथ-साथ किमाणा, डुमक, कलगोठ, जखोला और पल्ला से भी महिलाएं भगवान विष्णु को राखी बांधने मंदिर में पहुंचती हैं। जानकारी के मुताबिक वंशी नारायण मंदिर का निर्माण 6ठवीं शताब्दी में राजा यशोधवल के शासनकाल में बनाया गया था।

क्यों सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही खुलता है मंदिर

वंशी नारायण मंदिर साल में सिर्फ 1 दिन, रक्षाबंधन के दिन खुलता है। इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है। इस कहानी के मुताबिक राजा बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। तीन पग की जमीन मांगकर भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक तो भेज दिया लेकिन बलि ने उन्हें दिन-रात अपने साथ रहने के वचन में बांध लिया। राजा बलि के आग्रह पर भगवान विष्णु पाताललोक में उनका द्वारपाल बन गये। इधर भगवान विष्णु से दूर होने की वजह से माता लक्ष्मी परेशान हो गयी।

उन्होंने जब नारद मुनि से इस समस्या का समाधान मांगा तो नारद मुनि ने माता लक्ष्मी को पाताल जाकर राजा बलि को रक्षासूत्र बांधने की सलाह दी। इधर, माता लक्ष्मी को पाताल लोक का रास्ता मालुम नहीं था, इसलिए उन्होंने नारद मुनि को साथ चलने के लिए कहा। इसलिए साल में 364 दिन नारद मुनि भगवान विष्णु की पूजा करते हैं लेकिन उनकी अनुपस्थिति में कलगोठ गांव के जाख पुजारी ने 1 दिन भगवान विष्णु की पूजा कर ली। कहा जाता है कि इसलिए वंशी नारायण मंदिर में हमेशा कलगोठ गांव के जाख ही देवता के पुजारी होते हैं।
इधर, पाताल जाकर माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी और बदले में भगवान विष्णु को मुक्त करवा लिया।

कैसे पहुंचे वंशी नारायण मंदिर

वंशी नारायण मंदिर ऋषिकेश के जोशीमठ से करीब 255 किमी की दूरी पर है। जोशीमठ से 10 किमी की दूरी पर मौजूद हेलंग घाटी से उर्गम घाटी तक के लिए जीप मिलती है। उर्गम घाटी से पैदल ट्रेकिंग कर वंशीनारायण मंदिर पहुंचा जा सकता है। रास्ते में आपको अलकनंदा और कल्पगंगा नदियों का बेहद सुन्दर संगम भी दिखाई देगा। वंशी नारायण मंदिर का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून है, जो जोशीमठ से 20 किमी की दूरी पर है। ऋषिकेश यहां से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है।

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