बेहद सुन्दर नक्काशी, शानदार वास्तुकला और कोई न कोई पौराणिक कहानी कहता कलाकृति। इन्हीं वजहों से बारम्बार पर्यटक गुजरात के प्रमुख पर्यटन स्थल 'रानी की वाव' की तरफ खींचे चले आते हैं। वर्ष 2014 में यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट सूची में अपनी जगह बनाने वाली इस बावड़ी/बावली का इतिहास काफी पुराना है। सिर्फ इतिहास ही नहीं, बल्कि 'रानी की वाव' के साथ जुड़ा गहरा रहस्य भी सैलानियों को यहां आने के लिए मजबूर करता है।
क्या आप जानते हैं, 'रानी की वाव' सिर्फ एक बावली नहीं है, बल्कि इसके सबसे नीचले हिस्से में एक सुरंग भी है, जो अपने आप में गहरा रहस्य समेटे हुए है।
कब और किसने बनवाया था
ऐतिहासिक तथ्यों से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 1063 में चालुक्य राजवंश की रानी उदयमती ने अपने पति भीमदेव की याद में इस बावली 'रानी की वाव' का निर्माण करवाया था। वर्ष 1304 में जैन संत मेरुतुंगा ने भी कहा था कि उदयमती जो नरवरहा खंगरा की बेटी थी, ने पाटन में इस बावली का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि इस बावली को तैयार होने में 20 सालों का समय लग गया था।
आर्कियोलॉजीस्ट हेनरी कौसन और जेम्स बर्ग्स 1890 में पाटन में जब इस जगह पर पहुंचे थे, तब यह बावली पूरी तरह से कीचड़ और गाद में दबी हुई थी। उस समय 7 मंजीला इस बावली के कुछ खंभे और थोड़ा सा हिस्सा ही बस धरती के ऊपर दिखाई दे रहा था।
कैसे दब गयी कीचड़ में
'रानी की वाव' को पाटन में सरस्वती नदी, जो अब उस क्षेत्र से लुप्त हो चुकी है, के किनारे किया गया था। साल-दर साल सरस्वती नदी में लगातार आने वाली बाढ़ की वजह से धीरे-धीरे यह बावली कीचड़ और गाद में दबने लगी। आखिरकार एक समय ऐसा आया जब इसके बारे में गुजरात और पाटन के लोग पूरी तरह से भूल ही चुके थे।
लेकिन विदेशी आर्कियोलॉजीस्ट के यहां घुम कर जाने के कई सालों बाद 1940 के करीब 'रानी की वाव' बावली के बारे में लोगों को जानकारी मिली। यह बावली एक उल्टी मंदिर की तरह है, जिसके सबसे नीचले स्तर पर सबसे अधिक नक्काशी की गयी है।
कब शुरू हुई खुदाई
1980 में आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया ने 'रानी की वाव' बावली को पूरी तरह से खोद कर बाहर निकाला। यह वाव सोलंकी वंश और उस समय की शानदार कला और समृद्धि को दर्शाता है। इस बावली की लंबाई 64 मीटर, चौड़ाई 20 मीटर और गहराई 27 मीटर है।
पूरी बावली में कई लाइन्स में कलाकृतियों को उकेरा गया है। यहां 800 से अधिक कलाकृतियां हैं, जिसमें अधिकांश में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और उनसे जुड़ी पौराणिक कहानियों को दर्शाया गया है। साल 2014 में यह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट की लिस्ट में शामिल हुआ।
क्या है रहस्यमयी सुरंग की कहानी
हर पुरानी स्मारक जिस तरह से अपने अंदर इतिहास और कई कहानियां समेटे रहता है, ठीक उसी तरह कुछ रहस्यों को भी समेट कर रखता है। 7 में से 6 स्तरों को पार करने के बाद 'रानी की वाव' के सबसे नीचले स्तर पर जैसे ही अंतिम सीढ़ी पर आप पहुंचते हैं, वहां एक दरवाजा दिखाई देता है।
इस दरवाजे से आगे लंबी सुरंग मौजूद है। कहा जाता है कि यह सुरंग करीब 30 किमी लंबी है। बावली के सबसे नीचले स्तर पर मौजूद सुरंग पाटन के पास ही मौजूद सिद्धपुर गांव में जाकर खुलता है। कहा जाता है कि उस जमाने में राजा-रानी और राजपरिवार के सदस्य दुश्मनों से बचकर भाग निकलने के लिए इस सुरंग का इस्तेमाल किया करते थे।
कैसे पहुंचे पाटन
पाटन सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। पाटन का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मेहसाना है, जहां से पाटन की दूरी महज 1 घंटे की है। मेहसाना से पाटन के लिए बस मिल जाएगी। पाटन से मेहसाना के लिए शेयर वाली जीप भी चलती है। पाटन का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट अहमदाबाद है, जहां से पाटन की दूरी 125 किमी है। पाटन के लिए अहमदाबाद से गाड़ियां और बस मिल जाएंगी।



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