गुजरात के जूनागढ़ में हर साल आयोजित होती है धार्मिक गिरनार हरित परिक्रमा। जूनागढ़ के जंगलों में आयोजित होने वाली इस परिक्रमा में बड़ी संख्या में धार्मिक लोग शामिल होते हैं। गिरनार पर्वत गुजरात का सबसे ऊंचा पर्वत है, जिसे हिमालय का भी दादा माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार गिरनार पर्वत के चारों ओर 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। इसी वजह से हर साल लाखों की तादाद में श्रद्धालु गिरनार पर्वत की परिक्रमा में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं।
इस परिक्रमा को गिरनार लीली परिक्रमा के नाम से भी जाना जाता है जो एक बेहद कठिन यात्रा मानी जाती है। रास्ते में जंगलों से घिरा इलाका भी होता है और इन जंगलों में शेर और तेंदुए भी रहते हैं। लेकिन कहा जाता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ आगे बढ़ते हुए किसी भी तीर्थ यात्री को कभी कोई मुश्किल नहीं आयी है।

इस साल कब होगी गिरनार परिक्रमा?
गिरनार परिक्रमा जूनागढ़ के जंगलों में आयोजित होती है, जिसमें हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। हर साल कार्तिक महीने के सुद अगियारस को इस परिक्रमा की शुरुआत होती है जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूरी होती है। इस साल 12 नवंबर 2024 को गिरनार हरित परिक्रमा की शुरुआत होगी। यह परिक्रमा 15 नवंबर 2024 तक चलेगी। लगभग 36 किमी लंबी यह परिक्रमा पहाड़ों और घने जंगलों के बीच से होकर की जाती है जो बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है।
क्या होता है गिरनार परिक्रमा का यात्रा पथ?
इस धार्मिक परिक्रमा की शुरुआत जूनागढ़ के भवनाथ में दूधेश्वर मंदिर से होती है। 36 किमी लंबे इस परिक्रमा पथ में घने जंगलों से गुजरने के साथ-साथ पहाड़ी उतार-चढ़ाव भी आते हैं, जिन्हें पार करना पड़ता है। इस यात्रा का पहला पड़ाव जिना बावा का मंदिर और उसके बाद चंद्र मौलेश्वर का मंदिर होता है, जो भवनाथ मंदिर से लगभग 12 किमी की दूरी पर मौजूद है। इसके बाद श्रद्धालुओं का समूह हनुमान मंदिर और सूरज कुंड की ओर बढ़ता है जो जीना बावनी माधी से लगभग 8 किमी की दूरी पर मालवेला झील के पास स्थित है।

यात्रा का यह हिस्सा बड़ा शांतिदायक होता है जहां श्रद्धालु अपने ईश्वर की भक्ति में लीन नजर आते हैं। यात्रा का अगला हिस्सा मालवेला से बोरदेवी तक का होता है। परिक्रमा का 8 किमी लंबा यह हिस्सा बड़ा ही कठिन होता है, जिसमें खड़ी पहाड़ी पर चढ़ना और उतरना होता है। इसे मालवेलानी घोड़ी कहा जाता है। इन सभी कठिन यात्राओं को पार करते हुए श्रद्धालु आखिरकार इस परिक्रमा के आखिरी पड़ाव बोरदेवी माता के मंदिर में पहुंचते हैं, जहां यह परिक्रमा पूरी मानी जाती है।
मंदिर के आसपास झीलें और नदियां इस जगह की सुन्दरता में चार चांद लगा देती हैं। बोरदेवी माता मंदिर में पूजा अर्चना कर श्रद्धालु फिर से 8 किमी का भवनाथ मंदिर तक का यात्रा करते हैं, जिसे परिक्रमा के संपूर्ण होने का प्रतिक माना जाता है।

क्या है गिरनार पर्वत परिक्रमा की पौराणिक मान्यता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गिरनार पर्वत की परिक्रमा त्रिदेव महादेव, ब्रह्मा और विष्णु समेत पंचपांडवों ने भी की थी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बोरदेवी मंदिर, जहां यह परिक्रमा समाप्त होती है, वहां देवी सुभद्रा के साथ अर्जुन की शादी हुई थी। श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा के साथ अर्जुन की शादी करवाने के लिए गिरनार पर्वत की हरित परिक्रमा की थी। उन्होंने यह परिक्रमा कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा के बीच ही की थी और आखिरकार पूर्णिमा के दिन देवी सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ था।
अहमदाबाद से कैसे पहुंचे जूनागढ़?
अहमदाबाद से जूनागढ़ तक 2 तरीकों से पहुंचा जा सकता है - बस और ट्रेन। ट्रेन से जूनागढ़ पहुंचने में अहमदाबादवासियों को करीब 6.30 घंटे का समय लग जाता है। सौराष्ट्र जनता एक्सप्रेस, सोमनाथ एक्सप्रेस, पूणे वेरावल एक्सप्रेस आदि कई ट्रेनें हैं, जो अहमदाबाद से आपको जूनागढ़ पहुंचा देंगी। इसके साथ ही बस से अहमदाबाद से जूनागढ़ पहुंचने में भी लगभग 6 घंटों का समय लग जाता है। ट्रेन या बस दोनों का ही किराया ₹280-₹300 होता है।



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