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गुजरात का ऐतिहासिक मोढेरा सूर्य मंदिर, पर यहां नहीं होती है भगवान की पूजा, जानिए क्यों ?

भारत में दो सूर्य मंदिर काफी लोकप्रिय हैं। पूर्वी छोर पर स्थित ओडिशा में कोणार्क सूर्य मंदिर और पश्चिमी छोर पर गुजरात में मोढेरा सूर्य मंदिर। यह मंदिर अपनी उत्कृष्ठ वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। 11वीं सदी में बने इस सूर्य मंदिर के बारे में कहा जाता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान राम भी आत्म शुद्धि के लिए इस स्थान पर आ चुके हैं। पर क्या आप जानते हैं कि इस पवित्र मंदिर में आज किसी भी भगवान की पूजा नहीं होती है।

कहां है मोढेरा सूर्य मंदिर

sun temple modhera

मोढेरा सूर्य मंदिर गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित है। यह मंदिर पाटन से लगभग 30 किमी और अहमदाबाद 100 किमी की दूरी पर मौजूद है। पुष्पावती नदी के किनारे स्थित यह मंदिर अपनी विलक्षण वास्तुकला की वजह से दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मंदिर को दो हिस्सों में तैयार किया गया है, जिसमें पहला गर्भगृह और दूसरा हिस्सा सभामंडप है।

गर्भगृह के अंदर की लंबाई 51 फुट 9 इंच और चौड़ाई 25 फुट 8 इंच बतायी जाती है। सभामंडप में कुल 52 स्तंभ हैं, जिनपर विभिन्न देवी-देवताओं, रामायण और महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को दर्शाया गया है। ये 52 स्तंभ साल के 52 सप्ताहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभामंडप की ओर जाते हुए यहां की दीवारों पर भगवान सूर्य की 12 प्रतिमाएं उकेगी गयी हैं, जो साल के 12 महीनों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

सूर्य की पहली किरण से रोशन होता है गर्भगृह

modhera gujarat sun temple

मोढेरा सूर्य मंदिर को गुजरात का खजुराहो मंदिर कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ईरानी स्थापत्य शैली के आधार पर किया गया है। मंदिर का निर्माण करते समय इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह पर ही पड़े। आज भी 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्य की पहली किरण गर्भगृह में स्थित मूर्ति पर पड़ती है।

मंदिर का निर्माण वर्ष 1026 में सोलंकी वंश के सूर्यवंशी राजा भीमदेव प्रथम ने करवाया था। सोलंकी वंश के कुल देवता भगवान सूर्य ही थे, इसलिए उनके इस मंदिर का निर्माण करवाकर नित्य पूजा भी की जाती थी। मंदिर के आधार में असंख्य हाथियों की मूर्तियां बनी हुई हैं, जिन्हें गज पेटिका कहा जाता है।

ज्यामितीय आकार में बनी है बावड़ी

baori in modhera sun temple

मोढेरा मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि इस मंदिर में ईंटों व पत्थरों को जोड़ने के लिए चुने का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर के सभामंडप के आगे एक विशाल कुंड बना हुआ है, जिसे सूर्यकुंड या रामकुंड कहा जाता है। मकर संक्रांति के समय यहां भगवान सूर्य के दर्शन कर कुंड में स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

बावड़ी के पानी में जब इस मंदिर का प्रतिबिम्ब पड़ता है तो वह दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। सूर्य मंदिर के ठीक सामने की सीढ़ियों पर शेषशैया पर विराजमान भगवान विष्णु का मंदिर है। गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ है।

क्यों नहीं होती है पूजा

dome of sun temple modhera gujarat

किसी भी आम मंदिर में जो-जो चीजें होनी चाहिए, वह सब इस मंदिर में है। इसके बावजूद पिछले कई सौ सालों से मंदिर में पूजा नहीं होती है। दरअसल, देशभर के दूसरे मंदिरों की तरह ही मोढेरा सूर्य मंदिर भी इस्लामी आक्रांताओं की भेंट चढ़ गया था।

अलाउद्दीन खिलजी ने न सिर्फ इस मंदिर में तोड़फोड़ की बल्कि उसने मंदिर के गर्भगृह में स्थित भगवान सूर्य की स्वर्ण प्रतिमा और मंदिर में मौजूद खजाने को भी लूट लिया था। कहा जाता है कि खिलजी ने मंदिर को लूट व तोड़फोड़ कर उसे खंडित तथा अपवित्र कर दिया था। इसके बाद ही इस मंदिर में पूजा-पाठ वर्जनीय हो गया और सैंकड़ों साल बीत जाने के बावजूद आज भी इस मंदिर में कोई पूजा-पाठ नहीं करता है।

कैसे पहुंचे मोढेरा मंदिर

मोढेरा मंदिर गुजरात के मेहसाणा जिला मुख्यालय से लगभग 26 किमी की दूरी पर मौजूद है। मोढेरा मंदिर का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट अहमदाबाद एयरपोर्ट है, जो मंदिर से लगभग 97 किमी की दूरी पर है। रेलमार्ग मेहसाणा रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। मेहसाणा रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 28 किमी की दूरी पर मौजूद है। सड़क मार्ग से भी मेहसाणा पहुंचना आसान है। यह देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।

मोढेरा सूर्य मंदिर का निर्माण भले ही 11वीं सदी में किया गया हो लेकिन इस जगह का उल्लेख पुराणों में किया गया है। स्कंद व ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि मोढेरा के आसपास का पूरा क्षेत्र धर्मरन्य के नाम से जाना जाता था। रावण के वध के बाद भगवान राम ने अपने गुरु वशिष्ठ से किसी ऐसे स्थान के बारे में पूछा था, जहां जाकर वह आत्मशुद्धि कर सकें। तब गुरु वशिष्ठ ने श्रीराम को इस स्थान पर आने की सलाह दी थी।

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