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सूरत का किला, जिसे जीतने के बाद मुगल बादशाह अकबर को आया था यह तगड़ा Idea

गुजरात का सूरत शहर, न सिर्फ आज से बल्कि पिछले कई सौ सालों से ही व्यवसाय का केंद्र रहा है। आज भी सूरत को रेशम के कपड़ों से लेकर हीरे व कीमती पत्थरों से ही अपनी पहचान मिलती है। सूरत के बंदरगाहों से पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों ने काफी कमाई की थी।

सूरत शहर के बीचोबीच से होकर बहती ताप्ती नदी के किनारे ही स्थित है सूरत का किला...जो गुजरात की समृद्ध विरासत को पुरी दुनिया में पहचान दिलाने के साथ-साथ व्यापार का भी एक प्रमुख केंद्र था।

कब हुआ किले का निर्माण

सूरत म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन से मिली जानकारी के अनुसार सूरत किले का निर्माण वर्ष 1540 से 1546 के बीच करवाया गया था। बताया जाता है कि इस किले का निर्माण गुजराती सुल्तान महमूद शाह III 'खुदावंद खान' ने लगभग 1 एकड़ के क्षेत्र में करवाया था।

किले की वास्तुकला काफी ज्यादा पुर्तगाली वास्तुकला से प्रेरित बतायी जाती है। कहा जाता है कि पुर्तगालियों से बचने के लिए खुदावंद ने सुलेमान पाशा द्वारा युद्ध का मैदान छोड़कर ईडन भागने के बाद दीव से और जूनागढ़ से तोपे इस किले में लेकर आया था। यह किला बाहरी आक्रमणकारियों के खिलाफ वास्तुकला और रक्षात्मक कौशल दोनों को मूर्त रूप देने वाली एक संरचना का शानदार उदाहरण है।

तुगलक से लेकर ब्रिटिश तक, कई लोगों के रहा अधीन

अपने 700 सालों के इतिहास में सूरत के किले पर तुगलक, गुजराती सुल्तान, मुगल, डच और ब्रिटिश का अधिकार रहा है। कुछ इतिहासकारों का तो यह भी मानना है कि वास्तव में सूरत किले का निर्माण तुगलक काल में हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि जब 2015 में सूरत नगर निगम ने इस किले की मरम्मत की जिम्मेदारी उठायी तब उन्हें किले का कुछ ऐसा हिस्सा भी मिला जो तुगलक काल में निर्मित बताया जाता है।

कहा जाता है कि सुल्तान महमूद शाह III ने तुगलक काल में निर्मित इस किले को और मजबूती प्रदान कर इसका विस्तार करवाया था। दीवारों की ऊंचाई बढ़वाई थी, किले का प्रवेश द्वार शहर की ओर होने के साथ ही ताप्ती नदी की ओर भी बनवाया था।

84 देशों से होता था व्यापार

सूरत हमेशा से ही भारत का प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है। बताया जाता है कि सूरत किले से ताप्ती नदी के रास्ते से होकर करीब 84 देशों में व्यापार होता था। पूरे किले के 6 प्रमुख भाग हैं, जिसमें 4 बुर्ज, 2 छोटे बुर्ज, एक खाई और एक सीढ़ी है जो अलग-अलग समय के ऐतिहासिक महत्व को समझाता है। वर्ष 1573 में इस किले पर मुगल बादशाह अकबर ने जीत हासिल की। किले को जीतने के बाद जब अकबर यहां आया तो वह इस जगह को देखकर चकरा ही गयी।

किले को देख अकबर को आया Idea

इतिहासकारों के अनुसार जब अकबर सूरत किले को जीतकर यहां आया तो जलमार्ग से होने वाले 84 देशों में व्यापार को देखकर वह चौंक गया। बताया जाता है कि उसी समय अकबर के दिमाग में यह ख्याल आया कि अगर जल मार्ग से किले से 84 देशों में व्यापार हो सकता है तो फिर इस तरह पानी के रास्ते लोगों को हज के लिए मक्का क्यों नहीं भेजा जा सकता! बस फिर क्या था...इतिहासकारों का कहना है कि इसके बाद ही अकबर ने जलमार्ग से लोगों को हज के लिए भेजना शुरू कर दिया था।

हालांकि जैसे ही अंग्रेजों को इस शहर और सूरत बंदरगाह के रास्ते होने वाले व्यापार में इस किले के महत्व के बारे में पता चला तो अंग्रेजों ने इस हथियाने का सपना देखना शुरू कर दिया और आखिरकार हथिया भी लिया।

अंधेरे में क्यों डूबा सूरत किला?

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सूरत के इस किले को हथियाने के बाद अंग्रेजों की कमाई में तेजी से वृद्धि हुई। लेकिन जब प्राकृतिक कारणों से सूरत बंदरगाह बंद हो गया तो अंग्रेजों ने सूरत और इस किले को छोड़कर मुंबई का रूख किया। उन्होंने अपना मुख्यालय भी मुंबई ही स्थानांतरित कर दिया।

सूरत का किला पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का ऑफिस और बाद में ब्रिटिश सरकार के रेवेन्यू रिकॉर्ड का स्टोरेज ऑफिस बन गया। मुगलों के समय में जिस किले की दमक से आकर्षित होकर ही ब्रिटिश सूरत आए थे, धीरे-धीरे उसने अपनी दमक खो दी।

वर्तमान में सूरत नगर निगम ने इस किले की मरम्मत कर उसे अपनी पुरानी चमक वापस दिलाने की जिम्मेदारी उठायी है। आम लोगों के लिए भी सूरत किले के दरवाजे खुले हुए हैं, जो वहां जाकर म्यूजियम और किले को देख सकते हैं।

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