भगवान राम और सीता के सेवक हनुमान जी का चैत्र महीने की पूर्णिमा को आविर्भाव हुआ था, जिसे हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हनुमान भक्त हनुमान मंदिर में दर्शन हेतु जाते है। कुछ लोग व्रत भी धारण कर बड़ी उत्सुकता और जोश के साथ समर्पित होकर इनकी पूजा करते है। इस दिन सभी मंदिरो में तुलसीदास कृत रामचरितमानस एवं हनुमान चालीसा का पाठ होता है। जगह जगह भंडारे आयोजित किये जाते है।
इसी क्रम में आज हम आपको हनुमान जी के उन मन्दिरों से रूबरू कराते हैं, जो उन्ही स्थानों अपर बने हुए हैं, जअहं उन्होंने अपना समय व्यतीत किया,इनमे से कुछ मंदिर उनके जीवन की खास घटनायों से भी जुड़े हुए हैं..तो आइये जानते हैं बजरंगबली के खास मन्दिरों के बारे में

हनुमानगढ़ी,अयोध्या
राम की जन्मभूमि में स्थित हनुमानगढ़ी को सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है, जोकिसरयू नदी के दाहिने तट पर एक उंचे टीले पर स्थित है। और यहां तक पहुंचने के लिए करीब 76 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं। हनुमान गढ़ी, वास्तव में एक गुफा मंदिर है जहां मां अंजनी और बाल हनुमान की मूर्ति है जिसमें हनुमान जी, अपनी मां अंजनी की गोदी में बालक रूप में लेटे है। माना जाता है कि, इस मंदिर में मांगी हुई हर मन्नत को बजरंगबली पूरा करते हैं।

बड़े हनुमान जी, इलाहाबाद
संगम बांध के ठीक नीचे हनुमान जी की एक विशाल मूर्ति है, जोकि हनुमान जी की लेटी हुई मुद्रा में 20 फीट लम्बी प्रतिमा है। यह सम्पूर्ण भारत का एकमात्र मंदिर है, यहां हनुमान जयंती पर यहां पूरे देश से हजारों भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं।

सालासार बालाजी, राजस्थान
राजस्थान के चुरू जिले में हनुमान जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है जो सालासर बालाजी के नाम से जाने जाते हैं। इस मंदिर में हनुमानजी की यह प्रतिमा दाड़ी-मूंछ से सुशोभित है। बताया जाता है कि, हनुमान जी की यह प्रतिमा एक किसान को जमीन जोतते समय मिली थी, जिसे सालासर में सोने के सिंहासन पर स्थापित किया गया। बाला जी के प्रकट होने की कथा जितनी ही चमत्कारी है उतने ही बाला जी भी चमत्कारी और भक्तों की मनोकामना पूरी करने वाले हैं।Pc: Dausaanoop

मेहंदीपुर बालाजी

संकट मोचन हनुमान मंदिर, वाराणसी
मेंहदीपुर बालाजी
इस मंदिर में मुख्य रूप से प्रेत बाधा के निवारण के आने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है। हर दिन 2 बजे यहां प्रेतराज सरकार के दरबार में पेशी होती है, जिसमें कीर्तन आदि किया जाता है। इस मंदिर के प्रसाद को न तो कोई खा सकता है और न ही घर ले सकता है। यहां से कोई सुगंधित वस्तु भी घर नहीं ले जाया जा सकता है।
बताया जाता है कि ऐसा करने से प्रेत या भी ऊपरी साया आपके ऊपर आ सकती है। मेंहदीपुर बालाजी की मूर्ति में छाती के बायीं ओर एक छोटा सा छेद है, जिसमें से लगातार जल बहता है। कहा जाता है कि यह बालाजी का पसीना है। यहां आने से पहले भक्त 1 हफ्ते तक मांस-मछली, प्याज-लहसुन आदि का सेवन बंद कर देते हैं।
संकटमोचन मंदिर, वाराणसी
यह देश के ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है। वाराणसी का संकटमोचन मंदिर लगभग 400 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर की स्थापना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। मान्यतानुसार जब गोस्वामी तुलसीदास काशी में रहकर रामचरितमानस लिख रखे थे, तब उन्हें हनुमान जी के साक्षात दर्शन हुए थे। इसके बाद बजरंगबली मिट्टी का स्वरूप धरकर इसी स्थान पर स्थापित हो गये थे।
काशी में अपने निवास के दौरान तुलसीदास नित्यक्रिया से निवृत होने के लिए नाव से गंगा पार कर दूसरी ओर जाते थे। वहां एक बबूल का पेड़ था, जिसे वह हर दिन अपने लोटे से पानी दे देते थे। उस पेड़ पर एक भूत का निवास था। भूत ने जब तुलसीदास के इस कृत्य से खुश होने की बात बतायी तो तुलसीदास ने उससे हनुमान जी से मिलवाने के लिए कहा।
भूत ने तुलसीदास को बताया कि एक मंदिर में रोज रामायण का पाठ होता है। वहां जो गरीब भिखारी मिलेगा वहीं हनुमान जी होंगे। मंदिर में सबसे पीछे बैठे हुए कुष्ठ रोगी को देखकर गोस्वामी तुलसीदास समझ गये कि वहीं बजरंगबली हैं। तुलसीदास के आग्रह बजरंगबली ने उन्हें दर्शन दिया और वहीं स्थापित हो गये।



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