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कई ऋषियों की तपोभूमि है आजमगढ़, भगवान शिव से लेकर रामायण काल तक इसका सम्बन्ध

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के सबसे प्रसिद्ध जिलों में से एक है, जो अपने इतिहास और पौराणिक कथाओं के लिए जाना जाता है। तमसा नदी के किनारे पर बसे आजमगढ़ की स्थापना 1665 ईस्वी में करवाई गई थी, जिसे राजा विक्रमजीत सिंह गौतम के ज्येष्ठ पुत्र आजम शाह ने बसाया था और उसी के नाम पर इस जिले का नामकरण हुआ। पौराणिक मान्यताओं की मानें आजमगढ़ से भगवान शिव और माता का पार्वती का गहरा नाता है। इसके अलावा रामायण काल और ऋषि दुर्वासा से भी इस स्थान का संबंध बताया जाता है।

आजमगढ़ को लेकर पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं की मानें तो भगवान शिव की शक्ति माता सती ने यही पर अग्निदाह किया था, जब उनके पिता राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया था। यह पवित्र स्थल जिला मुख्यालय से महज 23 किमी. की दूरी पर स्थित है। इस स्थान पर हर महीने के पूर्णिमा वाले दिन मेले का आयोजन भी किया जाता है। वहीं, आजमगढ़ जिला मुख्यालय से 6 किमी. दूरी पर फूलपुर तहसील है, जहां दुर्वासा ऋषि का आश्रम है, यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन काफी बड़े मेले का आयोजन होता है। कहा जाता है कि यहां हजारों की संख्या विद्यार्थी शिक्षा लेने आया करते थे। इसके अलावा यहां पास में ही दत्तात्रेय का आश्रम, चंद्रमा ऋषि का आश्रम, बाबा मुसई दास की तपस्थली भी है। इसके अलावा आजमगढ़ को रामायण काल के कौशल राज का हिस्सा भी बताया जाता है।

azamgarh

आजमगढ़ का इतिहास

पौराणिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आजमगढ़ की भूमि का इतिहास हजारों-लाखों साल पुराना है, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मुगल काल से इसका इतिहास मालूम पड़ता है। 16वीं शाताब्दी के अंत में (1594 ईस्वी) दिल्ली की हुकूमत मुगल शासक जहांगीर के हाथों में थी, उस समय युसूफ खान को जौनपुर का सूबेदार नियुक्त किया गया। वहीं, पास में स्थित फतेहपुर के राजपूत चंद्रसेन सिंह के पुत्र अभिमान सिंह (अभिमन्यू सिंह) मुगलों के सिपहसालार थे।

उस समय आसपास के इलाकों में अशांति फैली हुई थी, जिसे समाप्त करने के लिए जहांगीर ने अभिमान सिंह को कमान सौंपी और उन्होंने विद्रोह को समाप्त कर दी, जिससे खुश होकर जहांगीर ने 1500 घुड़सवार के साथ सवा 9 लाख रुपये देकर उसे जौनपुर के पूर्वी इलाकों की कमान सौंप दी। इसके बाद उसने मेहनगर को अपनी राजधानी बनाई और बाद में इस्लाम धर्म स्वीकार कर अपना नाम दौलत इब्राहिम खान में परिवर्तित कर लिया और पुत्र न होने के कारण अपने भतीजे हरिवंश सिंह को अपना राज सौंप दिया। हरिवंश सिंह ने अपने शासनकाल में मेहनगर का किला, हरी बांध पोखरा, लखराव पोखरा व रानी सागर पोखरा का निर्माण करवाया था। इसके अलावा उसने अपने चाचा दौलत इब्राहिम खान (अभिमान सिंह) की याद में मेहनगर में ही 36 दरवाजों वाला मकबरा भी बनवाया, जिसकी वास्तुकला और कारीगरी की मिशाल आज भी दी जाती है।

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आजम शाह के नाम पर हुआ आजमगढ़ का नामकरण

बाद में हरिवंश सिंह ने भी इस्लाम धर्म कबूल कर लिया, जिसके बाद उनकी रानी ज्योति कुंवर सिंह अपने छोटे बेटे को लेकर राजकुमार विक्रमजीत सिंह को लेकर महल छोड़ चली गई। उसके बाद वे जहां रहने आईं, उसी स्थान को वर्तमान समय में 'रानी की सराय' के रूप में जाना जाता है। बाद में राजा विक्रमजीत सिंह ने एक मुस्लिम महिला से शादी कर इस्लाम स्वीकार लिया और उनको दो बेटों- आजम व अजमत की प्राप्ति हुई। 1665 ईस्वी में मुगल शासक शाहजहां के शासनकाल के दौरान आजम शाह ने ऐलवाल और फुलवरिया नामक गांवों के स्थान पर एक नगर बसाया, जिसका नाम उन्हीं के नाम पर आजमगढ़ पड़ा। इसके अलावा उसने तमसा नदी के तट पर एक किले का भी निर्माण करवाया।

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472 लोगों ने 1857 की लड़ाई में लिया था हिस्सा

कहा जाता है कि 1675 ईस्वी में आजम शाह की मृत्यु के बाद उसके भाई अजमत के वंशज इरादत शाह (अजमत का पौत्र व मोहब्बत शाह का पुत्र) ने आजमगढ़ की गद्दी को संभाला। 18 सितम्बर 1832 ईस्वी को आजमगढ़ जिले का गठन किया गया, इस दौरान आजमगढ़ समृद्धि की ओर लगातार बढ़ रहा था। 1857 ईस्वी में स्वंतत्रता संग्राम व 1893 ईस्वी में गौ-हत्या विरोधी आंदोलन के अलावा यहां कुछ खास घटना नहीं घटी। 1857 की लड़ाई में आजमगढ़ के 472 लोगों ने हिस्सा लिया, जिनके परिवार को आजादी के बाद साल 1973 ईस्वी में ताम्र पदक से सम्मानित किया गया था। आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी ने भी आजमगढ़ में कई सभाएं की। इसके अलावा यहां कई पवित्र स्थल और ऐतिहासिक स्थान भी है। यहां कई महान हस्तियों ने भी जन्म लिया है और ये कईयों की कर्मभूमि भी रही है।

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