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हावड़ा में होती है स्वामी विवेकानंद की पगड़ी की पूजा, जानिए क्या है खास

कोलकाता से सटे हावड़ा शहर के एक परिवार में आज भी स्वामी विवेकानंद की पगड़ी की पूजा किसी हिंदू देव-देवी के तर्ज पर ही की जाती है। यह पगड़ी इस परिवार को स्वामी विवेकानंद ने खुद उपहार में दी थी। सिर्फ इतना ही नहीं, यहीं वह परिवार है जहां पहली बार स्वामी विवेकानंद की अनुमति से ही भगवान के रूप में उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का मंदिर तैयार किया गया था और उनकी पूजा शुरू हुई थी।

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आज 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की 161वीं जयंती मनायी जा रही है। देशभर में स्वामी विवेकानंद की जयंती को युवा दिवस के तौर पर बड़े ही धुम-धाम से मनाया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद ने ही सालों पहले देश के युवाओं को आधुनिक समाज की वो छवि दिखाई थी जो इतने सालों बाद भी बेहद प्रासंगिक है। उनके द्वारा शिकागो धर्म सम्मेलन में दिया गया भाषण सुनकर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। स्वामी विवेकानंद की जयंती पर उनसे जुड़ी एक बेहद दिलचस्प घटना के बारे में हम आपको बताते हैं।

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स्वामी विवेकानंद को अधिकांश समय केसरिया परिधान और पगड़ी धारण किये हुए देखा जाता था। हावड़ा के एक परिवार में पिछले 100 सालों से भी अधिक समय से स्वामी विवेकानंद की पगड़ी को न सिर्फ संभाल कर रखा गया है बल्कि उसकी हर रोज पूजा भी की जाती है। साल में सिर्फ एक दिन माघी पूर्णिमा के दिन इस पगड़ी का दर्शन करने के लिए इसे भक्तों के सामने लाया जाता है।

हावड़ा निवासी नवगोपाल घोष को यह पगड़ी स्वामी विवेकानंद ने खुद उपहार में दिया था। उन्होंने नवगोपाल घोष के घर भोजन करने के बाद संतुष्ट होकर यह उपहार दिया था। इस पगड़ी के पीछे की कहानी बताते हुए नवगोपाल घोष के परपोते प्रोफेसर सुब्रत घोष का कहना है कि शिकागो में भाषण देकर भारत वापस लौटने के बाद उनके परदादा नवगोपाल घोष ने स्वामी विवेकानंद को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया था। स्वामी विवेकानंद की तरह ही नवगोपाल घोष भी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे।

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जानकारी के अनुसार 6 फरवरी 1898 को अपने कुछ शिष्यों के साथ आलमपुर मठ के पास के घाट से तीन नावों में सवार होकर स्वामी विवेकानंद हुगली नदी पार कर हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर पहुंचे। नाव से उतरकर वह मध्य हावड़ा के रामकृष्णपुर गलि में स्थित नवगोपाल घोष के घर पहुंचे और वहां उनका स्वागत सत्कार करने के बाद उन्हें भोजन करवाया जाता है। विवेकानंद नवगोपाल घोष की पत्नी द्वारा पकाये गये भोजन से संतुष्ट हुए थे।

भोजन करने के बाद उन्होंने नवगोपाल घोष से कहा, "इस समय तुम्हे देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है, लेकिन मैं अपनी यह पगड़ी तुम्हें उपहार में देकर जा रहा हूं।" स्वामी विवेकानंद को यह पगड़ी शिकागो जाने से पहले महाराज अजीत सिंह ने दी थी। इसके साथ ही उन्होंने नवगोपाल घोष को सोने की एक छोटी सी डिब्बी भी पकड़ाई थी। सोने की इस डिब्बी में रामकृष्ण परमहंस की अस्थी का अंश रखा हुआ था।

नवगोपाल घोष ने स्वामी विवेकानंद की अनुमति लेकर बाद में रामकृष्ण परमहंस का एक मंदिर बनवाया। इस मंदिर में पहली रामकृष्ण परमहंस की मूर्ति की स्थापना और उनकी पूजा एक भगवान के रूप में मिली। या ऐसा कहा जा सकता है कि इस मंदिर के निर्माण के बाद ही रामकृष्ण परमहंस को पहली बार भगवान का दर्जा दिया गया था।

इसके साथ ही रामकृष्ण परमहंस की मूर्ति के ठीक बगल में स्वामी विवेकानंद की वह पगड़ी आज भी सुरक्षित रखी हुई है जिसकी नियमित रूप से पूजा की जाती है। साल में सिर्फ एक बार माघी पूर्णिमा के दिन इस पगड़ी का दर्शन करने के लिए इसे बाहर निकाला जाता है।

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