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हैदराबाद का बंशीलालपेट बावड़ी : सालों तक परित्यक्त रहा, अब बना घूमने की नयी जगह, जानें इतिहास

हैदराबाद से सटे सिकंदराबाद का एक निम्न-मध्यम वर्गीय इलाका, जहां सालों से विरान परित्यक्त (Abanded) पड़ी थी एक बावड़ी। लगभग एक साल पहले अचानक एक दिन पता चला कि यहां तो हैदराबाद का Hidden Gem ही मौजूद है। इलाके और बावड़ी की साफ-सफाई के बाद आज वहीं विरान पड़ी बावड़ी पर्यटकों से गुलजार है।

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हैदराबाद में घूमने जाने की एक नयी जगह के तौर पर उभरी है बंशीलालपेट बावड़ी। कहानी फिल्मी लगती है न...पर यकिन मानिए यहीं सच है।

सालों से बंशीलालपेट बावड़ी का इस्तेमाल एक कुड़े के ढेर की तरह किया जा रहा था। बताया जाता है कि बंशीलालपेट बावड़ी एक या दो नहीं बल्कि पूरे 2000 टन कुड़े के नीचे दब गयी थी। पर क्यों इतने सालों तक यह शानदार बावड़ी परित्यक्त पड़ी रही? क्यों लोगों ने इसका इस्तेमाल करना बंद कर दिया था? अचानक क्यों सेठी बंसीलाल ने ऐसी एक शानदारी बावड़ी बनाने का फैसला लिया और कौन थे सेठ बंशीलाल?

क्या है इस बावड़ी का इतिहास

बंशीलालपेट बावड़ी को किसने बनवाया था, इस बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। वास्तुकला के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह बावड़ी 17वीं शताब्दी में निर्मित हो सकती है। वर्ष 1954 में फराओ एंड कंपनी द्वारा प्रकाशित मानचित्र में इस बावड़ी का उल्लेख नगण कुंता के नाम से किया गया है। इस मानचित्र में आगे लिखा है कि बावड़ी चारों तरफ से इमली और ताड़ के बागिचे से घिरी हुई थी।

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वर्ष 1933 में ब्रिटिश अधिकारी टी.एच. किज ने इस बावड़ी के चारों तरफ एक मॉडल गांव बनाने का फैसला लिया। इस परियोजना में आर्थिक रूप से स्थानीय व्यापारी सेठ बंशीलाल ने मदद पहुंचायी थी। इसलिए वर्तमान समय में इस बावड़ी को बंशीलालपेट बावड़ी के नाम से जाना जाता है।

क्यों विरान हो गयी बावड़ी

कहा जाता है कि देश को आजादी मिलने के बाद भी इस बावड़ी में जान थी। लोग यहां गणेशोत्सव की मूर्तियां विसर्जित करने से लेकर बठुकम्मा उत्सव के दौरान बावड़ी की सीढ़ियों को फूलों से सजाने जैसी गतिविधियों में बड़े चाव से हिस्सा लेते थे। लेकिन 1980 के दशक में अचानक से सब कुछ बदल गया। कहा जाता है कि इस समय बावड़ी में गिरने से 2 लोगों की मौत हो गयी थी। इसके बाद धीरे-धीरे लोगों ने बावड़ी पर आना छोड़ दिया और यह बावड़ी परित्यक्त होकर कुड़े के ढेर में बदलने लगी। यहां से आने वाली भयंकर दुर्गंध की वजह से इस बावड़ी के सामने से होकर गुजरना लोगों के दुश्वार हो गया था।

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लगभग 4 दशकों तक कुड़े के ढेर के नीचे दबे रहने के बाद आखिरकार साल 2022 में इस बावड़ी के पुनर्रुद्धार का काम शुरू किया गया जिसमें तेलांगना अर्बन डेवलपमेंट विभाग और एक समाजसेवा संस्थान ने साथ मिलकर काम किया। 6 मंजीला इस बावड़ी को साफ करते समय यहां से हजारों टन कुड़ा साफ किया गया।

यह बावड़ी जमीन से 50 फीट नीचे की ओर जाती है। आखिरकार 5 दिसंबर 2022 को इस बावड़ी को आम लोगों के लिए खोल दिया गया और उसके बाद से ही यह हैदराबाद में घूमने की एक नयी जगह के रूप में लोगों को खूब पसंद आ रही है।

क्या है बावड़ी में घूमने का समय

मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के अनुसार बंशीलालपेट बावड़ी तो 6 मंजीला है लेकिन सुरक्षात्मक कारणों से पर्यटकों को 300 सालों पुरानी इस बावड़ी की सिर्फ पहली मंजील तक ही जाने की अनुमति है। बावड़ी में घूमने के लिए पर्यटक सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक और शाम को 4 बजे से रात 8 बजे तक जा सकते हैं। बंशीलालपेट बावड़ी में प्रवेश करने के लिए आपको ₹50 प्रति व्यक्ति का प्रवेश शुल्क चुकाना होगा।

बावड़ी के अंदर फोटोग्राफी की अनुमति है। इसलिए अगर आपको फोटोशूट करवाना हो या प्री-वेडिंग शूट करवाना हो, तो इस बावड़ी पर आकर किया जा सकता है। बहुत ही Unique लोकेशन लगेगा। सोशल मीडिया पर शेयर करते ही सब फोटो में बैकग्राउंड लोकेशन के बारे में ही चर्चाएं करेंगे।

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