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» »इस मंदिर में होती है माता के गर्भ की पूजा, प्रसाद के रूप में मिलती है खून से लिपटी हुई रूई

इस मंदिर में होती है माता के गर्भ की पूजा, प्रसाद के रूप में मिलती है खून से लिपटी हुई रूई

भारत मंदिरों का देश कहा जाता है। यहां देश के कोने-कोने में कई धार्मिक स्थल है, जिनकी अपनी अलग-अलग मान्यताएं है। दरअसल, जब माता सती ने अपने शरीर का त्याग किया था, तब भगवान शिव ने उनके शरीर को देखकर खूब तांडव मचाया था और उनके शरीर को गोद में लेकर जमीन आसमान एक कर दिया था। उस दौरान माता के शरीर के अलग-अलग अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे और वहां शक्ति रूप में माता की पूजा की जाने लगी। इस दौरान माता सती की योनि (गर्भ) नीलाचल पहाड़ी की चोटी पर गिरी थी, जो आज के समय में असम के गुवाहाटी में स्थित है। तब यहां माता कामाख्या के रूप में माता सती की पूजा की जाती है।

मंदिर परिसर में वार्षिक प्रजनन उत्सव का आयोजन

कामाख्या मंदिर परिसर की ओर से हर साल एक वार्षिक प्रजनन उत्सव का आयोजन किया जाता है जिसे अंबुबासी पूजा के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी का मासिक धर्म होता है। तीन दिनों तक बंद रहने के बाद, मंदिर चौथे दिन उत्सव के साथ फिर से खुल जाता है। इस पर्व के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी भी लाल हो जाती है। कहा यह भी जाता है कि मंदिर के चार गर्भगृहों में 'गरवर्गीहा' सती के गर्भ का घर है।

kamakhya devi mandir

प्रसाद के रूप में मिलती है खून से सनी हुई रूई

कहा जाता है कि इस दौरान दैवीय शक्ति प्राप्त करने के लिए साधू अलग-अलग गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। ये जानकार आपको शायद हैरानी हो, लेकिन श्रद्धालु इस मंदिर में माता कामाख्या देवी के मासिक धर्म के खून से लिपटी हुई रूई को प्राप्त करने के लिए घंटों तक लाइन में खड़े रहते हैं। खून से सनी हुई यही रूई माता का प्रसाद भी मानी जाती है।

kamakhya temple

कामाख्या देवी मंदिर को लेकर मान्यता

कामाख्या मंदिर में माता सती की योनि की मूर्ति की पूजा की जाती है, जो गुफा के एक कोने में विराजित है। इसके अलावा इस मंदिर में देवी की कोई अतिरिक्त मूर्ति नहीं है। इस मंदिर के मान्यता के अनुसार, माता के मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलती है। असम के गुवाहाटी में स्थित यह मंदिर तांत्रिक विधाओं का गढ़ माना जाता है। माता कामाख्या सभी की इच्छाओं को पूरी करती हैं और इस मंदिर के पंडित भी तांत्रिक विद्या में निपुण हैं।

यह मंदिर 8वीं शाताब्दी के आसपास की बताई जाती है। 16वीं शाताब्दी में बिहार के राजा नार नारायण ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद समय-समय पर कई बार मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।

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