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UP का वह शहर जो है इत्र की राजधानी, यहां की मिट्टी से भी आती है खुशबू

आपने कई शहरों के गंदगी से भरे होने और सड़कों पर जहां-तहां फैले कचड़े से बदबू आने की खबरें तो आए दिन अखबारों में पढ़ी होंगी। लेकिन आज हम आपको भारत के ही एक शहर के बारे में बता रहे हैं जिसे खुशबूदार शहर कहा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा। इस शहर को भारत की इत्र की राजधानी भी कहा जाता है। वह शहर है उत्तर प्रदेश का कन्नौज।

Perfume spray

इस शहर की हवाओं में भी इत्र की खुशबू तैरती है। संकरी गलियों से होकर गुजरते समय लगभग हर घर से आने वाली इत्र की खुशबू सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोगों को अपना दीवाना बना देती है। कन्नौज में इत्र बनाने का काम आज से नहीं बल्कि बरसों से चल रहा है। बताया जाता है कि इस खुशबूदार शहर का इतिहास करीब 200 साल पुराना है।

हाथों से बनता है इत्र

Essential oil

पिछले कई सालों में हर क्षेत्र में तकनीकी विकास हुआ है। हाथों से होने वाला काम अब झटपट मशीनों के माध्यम से होने लगा है। लेकिन कन्नौज में आज भी पारंपरिक तरीके से फूलों के रस से इत्र बनाने का काम किया जाता है। इस शहर में कुछ परिवार तो ऐसे हैं, जिनकी 8वीं या 9वीं पीढ़ी इत्र बनाने का काम कर रही है। कन्नौज में बनने वाले इत्र की डिमांड सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के भी कई शहरों में होती है। इस वजह से ही कन्नौज को इत्र नगरी या इत्र की राजधानी कहा जाता है। कन्नौज में बनने वाले इत्र की मांग अमेरिका, ब्रिटेन, अरब, फ्रांस, ओमान, सिंगापुर समेत कई और देशों में भी है।

600 साल पुरानी है तकनीक

Perfume glass

जानकारों का मानना है कि कन्नौज शहर में इत्र बनाने की देसी तकनीक एक या दो नहीं बल्कि 600 साल पुरानी है। इत्र बनाने की यह कला कन्नौज में रहने वाले लोगों ने फारसी कारीगरों से सीखी थी। इन कारीगरों को मुगल बेगम नुरजहां ने यहां बुलाया था। उन्होंने फारसी कारीगरों को गुलाब के फूलों से खास देसी इत्र तैयार करने के लिए ही बुलाया था। उसके बाद से लेकर आज तक कन्नौज में इत्र का निर्माण होता रहा है। समय के साथ-साथ कन्नौज में पारंपरिक तरीके से बनने वाले इत्र की डिमांड भी बढ़ती गयी और अब यह डिमांड विदेशों तक पहुंच चुकी है।

ऐसे बनता है इत्र

Kannauj perfume

कन्नौज में फूलों की पंखुड़ियों से जो देसी इत्र तैयार किया जाता है, वह डिस्टिलेशन प्रक्रिया के तहत होता है। इसमें बड़े-बड़े पात्र में फूलों की पंखुड़ियों को साफ कर पानी में डालकर आग पर चढ़ा दिया जाता है। इन पात्रों को पूरी तरह ढंककर सील कर दिया जाता है और उनके ढक्कन से एक पाइपनुमा आकार दूसरे सुराहीनुमा पात्र में लगी रहती है। जैसे-जैसे आग पर चढ़े पात्र का पानी गर्म होता है, वह फूलों की पंखुड़ियों को भी गर्म करता है। इस तरह पाइपनुमा आकार से होते हुए इत्र या तेल निकलकर दूसरे पात्र में जमा होता रहता है, जिसे बाद में पैक्ड बोतल में बेचा जाता है। कन्नौज में बनने वाली इत्र में अल्कोहल का इस्तेमाल नहीं होता है।

यहां की मिट्टी से भी आती खुशबू

Perfume bottle

बारिश की पहली बुंदों के मिट्टी में पड़ने के साथ ही उससे आने वाली खुशबू किसे पसंद नहीं है। लेकिन पहली बारिश के बाद वह खुशबू भी ना जाने कहां गायब हो जाती है। पर आपको जानकर हैरानी होगी कि कन्नौज में एक प्रकार का इत्र तैयार किया जाता है, जिसमें पहली बारिश के मिट्टी से आने वाली खुशबू होती है। इसे खुशबू को बेस ऑयल के मिलाकर विशेष इत्र बनाया जाता है। इसके अलावा कन्नौज में गुलाब, मोगरा, केवड़ा, चमेली, मेंहदी, गेंदा, शमामा, मास्क-अंबर, कस्तूरी, खस, चंदन और जैस्मिन के इत्र भी बनाए जाते हैं। कन्नौज में असम की एक विशेष लकड़ी 'असमकीट' से बनने वाली इत्र अदर ऊद सबसे ज्यादा लोकप्रिय और महंगी है।

कैसे पहुंचे कन्नौज

गंगा तट पर बसा कन्नौज हर्षवर्धन के साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। इस शहर ने इत्र बनाने की प्राचीन कला को आज तक सहेज कर रखा हुआ है। कन्नौज से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट कानपुर है, जो यहां से करीब 100 किमी दूर है। कानपुर से आप बस, ट्रेन या टैक्सी से कन्नौज पहुंच सकते हैं। सड़क मार्ग से कन्नौज देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। अगर आप रेलमार्ग से कन्नौज आना चाहते हैं तो दिल्ली, कानपुर, लखनऊ से आपको कन्नौज के लिए ट्रेनें आसानी से मिल जाएंगी।

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