देशभर में होलीका दहन से शुरू हुआ जश्न होली के दिन खत्म हो जाता है। इन दोनों दिनों में हर गली-हर मुहल्ले में बस गुलाल और गीले रंगों से सराबोर लोग ही नजर आते हैं। लेकिन कानपुर वालों की बात ही निराली होती है। कानपुर में एक नहीं बल्कि पूरे 7 दिनों तक होली मनायी और गुलाल उड़ाये जाते हैं।
रंगभरी एकादशी के दिन से शुरू होने वाला होली का जश्न अगले 7 दिनों तक चलता है। जिस तरह बरसाना की लट्ठमार, नंदगांव की लड्डूमार या फिर बनारस की मसान होली फेमस है, ठीक उसी तरह कानपुरिया होली और उसके साथ ही लगने वाला गंगा मेला भी बड़ा मशहूर है। लेकिन इस मेले में भी एक ट्वीस्ट है। क्या आपको पता है, कानपुर के गंगा मेले का इतिहास क्रांतिकारियों से जुड़ा हुआ है!

कब है कानपुर गंगा मेला?
कानपुर गंगा मेला देशभर में एक अलग स्थान रखता है। इस साल कानपुर होली मेला का 83वां संस्करण आयोजित होने वाला है। 30 मार्च, शनिवार को अनुराधा नक्षत्र में प्राचीन परंपरा के आधार पर ही कानपुर गंगा मेला का आयोजन होगा।
क्या है कानपुर होली मेला का इतिहास?
कानपुर को क्रांतिकारियों का शहर कहा जाता है। कानपुर में 7 दिनों तक जो होली मनायी जाती है उसके साथ ही गंगा मेला भी जुड़ा हुआ है। कानपुर की होली के आखिरी दिन अनुराधा नक्षत्र में खास होली खेली जाती है, जिस दिन गंगा मेला का आयोजन किया जाता है। यह मेला और होली 1942 के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ा हुआ है, जिस समय देश में ब्रिटिश राज था।

कानपुर का दिल कहा जाता है हटिया, जहां लोहे, स्टील, कपड़ा और गल्ले का कारोबार होता है। 1942 में होली वाले दिन जब पूरे देश में होली मनायी जा रही थी, तब हटिया बाजार के रज्जन बाबू पार्क में कुछ नौजवान क्रांतिकारी भी होली खेलने के दौरान आजादी के नारे लगाने लगे और वहां तिरंगा फहरा दिया। बस फिर क्या था...जैसे ही अंग्रेजों को इसकी भनक लगी वे घोड़े पर सवार होकर पार्क में पहुंच गये।
यूं हुई मेले की शुरुआत
अंग्रेज सिपाहियों ने पार्क से तिरंगा उतारा और करीब 45 क्रांतिकारियों को जेल भेज दिया। यह खबर कानपुर में जंगल की आग की तरह फैली और मजदूर, साहित्यकार, व्यापारी से लेकर आम जनता तक विरोध में उतर गयी। सभी ने काम करने से इंकार कर दिया। पूरे कानपुर का कारोबार ठप्प पड़ गया, सड़कों पर चक्का जाम होने लगे। इनका साथ सरकारी कर्मचारियों ने भी दिया।
आखिरकार अंग्रेजों ने होली के 6 बाद अनुराधा नक्षत्र के दिन सभी क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया। क्रांतिकारियों को जुलूस के रूप में पूरे शहर में घूमाया गया और हटिया बाजार में आकर जमकर होली खेली गयी। तभी से कानपुर में 7 दिनों तक होली और गंगा मेला की शुरुआत हुई।

अब ऐसे मनती है होली
कानपुर में होली के दिन से भी अधिक होली गंगा मेला के दिन खेली जाती है। गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस की तरह गंगा मेला के दिन सुबह ध्वजारोहण और राष्ट्रगान गाया जाता है। फिर क्रांतिकारियों को नमन कर रंग का ठेला निकलता है। यह ठेला जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, जुलूस का आकार लेता रहता है। सड़कों पर रंग से भरे ड्रम, ऊंट-घोड़े आदि और हजारों की संख्या में लोग इस जुलूस में चलते हैं।
कानपुर के दर्जन भर मोहल्लों में घूमने के बाद रज्जन बाबू पार्क में यह जुलूस खत्म होता है। इसके बाद शाम को सरसैया घाट पर गंगा मेला लगता है, जहां लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की बधाई देते हैं। इस मेले में बड़ी तादाद में तरबूज आते हैं। अगर आप यहां जाते हैं, तो मेले से रसीले तरबूज जरूर खरीदना।
किन रास्तों से गुजरेगा रंग का ठेला
- रज्जन बाबू पार्क (प्रारंभ)
- जनरलगंज बाजार
- मनीराम बगिया
- मेस्टन रोड
- चौक
- टोपी बाजार
- कोतवालेश्वर मंदिर चौक
- चौक सर्राफा
- बीच वाला मंदिर मेस्टन रोड
- कोतवाली चौराहा
- संगमलाल मंदिर
- कमला टावर
- फीलखाना
- बिरहाना रोड
- नयागंज चौराहा
- शतरंगी मोहाल
- लाठी मोहाल
- जनरलगंज बाजार होते हुए हटिया रज्जन बाबू पार्क में खत्म।



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