किसी समय पाकिस्तान और उसके जैसे कई देश भारत का अभिन्न भाग थे, वहीं लगातार मुगलों के आक्रमण के कारण वे हमारे हाथ से निकल गए। लेकिन हिंदू धर्म के कई मंदिर, ऐतिहासिक स्थल और दुर्ग आज भी कई देशों में स्थित हैं। उन्हीं में से एक है भगवान शिव को समर्पित और महाभारत काल से जुड़ा हुआ पाकिस्तान का कटासराज मंदिर।
कटासराज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल जिले से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर की कथा भगवान शिव द्वारा माता सती की याद में बहाए गए आंसू तथा महाभारत काल में पांडवों को मिले वनवास से जुड़ी हुई हैं।

कटासराज मंदिर कहा है
कटासराज मंदिर पाकिस्तान के पंजाब राज्य में है। पाकिस्तान के पंजाब के चकवाल जिले में चोव़ा सैदानशाह नामक कस्बा है, वही स्थित है कटासराज मंदिर। यह मंदिर पाकिस्तान के दो बड़े शहरों लाहौर और इस्लामाबाद के बीच के मोटरवे के पास साल्ट रेंज की पहाड़ियों पर है जिसकी ऊंचाई दो हज़ार मीटर के आसपास है।

कटासराज की कहानी
कटासराज मंदिर का सबसे प्राचीन इतिहास भगवान शिव और माता सती के आत्म-दाह से संबंधित हैं। जब माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान करने पर स्वयं को अग्नि के हवाले कर दिया था तब भगवान शिव अत्यंत दुख और अवसाद में चले गए थे। उन्होंने भयंकर तांडव नृत्य किया था जिसे किसी प्रकार देवताओं और भगवान विष्णु के द्वारा शांत करवाया गया था।
इसके बाद भी भगवान शिव अत्यंत दुखी थे और माता सती के विरह में शिव जी की आँखों से लगातार आंसुओं की धारा बह रही थी। भगवान शिव माता सती की याद में इतना रोये थे कि उनके आंसुओं से दो कुंड निर्मित हो गए थे जिसमे से एक कटासराज मंदिर में है तो दूसरा राजस्थान के पुष्कर में। कटासराज मंदिर में स्थित इस कुंड को कटाक्ष कुंड के नाम से जाना जाता हैं।

महाभारत काल से जुड़ी कटासराज मंदिर की कथा
महाभारत के युद्ध से पहले पांडवों और कौरवों के बीच द्यूत क्रीडा हुई थी और इसी के फलस्वरूप पांडवों को 13 वर्ष का वनवास मिला था। तब पांडवों ने अपने वनवास काल का कुछ समय इस क्षेत्र के आसपास भी बिताया था। वनों में भटकते हुए जब पांडवों को प्यास लगी तो उसमे से एक पांडव इस कटाक्ष कुंड से जल लेने आया। उस समय इस जगह को द्वैतवन के नाम से जाना जाता था जो पवित्र सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित था।
उस समय इस कुंड पर यक्ष का अधिकार था। उसने जल लेने आए पांडव से अपने सवाल का जवाब देने पर ही जल लेने को कहा। जब पांडव जवाब नहीं दे पाया तो यक्ष ने उसे मूर्छित कर दिया। इस तरह एक-एक करके सभी पांडव आए और मूर्छित होते गए।
अंत में पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर आए और यक्ष ने उनके सामने भी यही शर्त रखी लेकिन युधिष्ठिर ने अपनी बुद्धिमता का परिचय देते हुए यक्ष के सभी प्रश्नों के सही उत्तर दिए। इससे यक्ष उनसे इतना प्रसन्न हुए कि उन्होंने सभी पांडवो को वापस चेतना में ला दिया और उन्हें वहां से जल पीने की अनुमति भी दे दी।
कटासराज मंदिर का रोमन जाति से संबंध
कलियुग की शुरुआत के बाद यह स्थल कला, संगीत और अध्ययन का बहुत बड़ा केंद्र बन गया। इसके पास में ही भारत का विश्वप्रसिद्ध गुरुकुल तक्षशिला हुआ करता था। इस कारण यहाँ पर हजारों की संख्या में कलाकार, संगीतकार और विद्वान रहा करते थे और अध्ययन करते थे।
इन्हीं संगीतकारों को ही यूरोप में रहने वाले रोमन या जिप्सी जाति के लोगों के पूर्वज माना जाता है। दरअसल दसवीं सदी आते-आते जब इस धरती पर मुगलों का आक्रमण बढ़ गया तब यहाँ के कलाकार और संगीतकार कई देशों से होते हुए धीरे-धीरे यूरोप में बस गए थे। आज यूरोप में लगभग 1 से 2 करोड़ रोमन जाति के लोग रहते हैं।
रोमन जाति के लोगों की भाषा के कई शब्द संस्कृत और हिंदी से मिलते हैं। हालाँकि कुछ लोग इसको लेकर संदेह प्रकट करते हैं लेकिन इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि यूरोप के रोमन जाति के पूर्वजों का संबंध भारत की भूमि से था।
कटासराज मंदिर का विध्वंस
सातवीं शताब्दी के बाद भारत की पश्चिमी सीमा लगातार मुगलों के आक्रमण और लूटपाट को देख रही थी। मुगलों की बर्बर सेना आती, बिना युद्ध के नियमों के युद्ध करती, आम प्रजा में भयंकर लूटपाट और मारकाट मचाती, मंदिरों, गुरुकुलों को नष्ट कर देती फिर वापस चली जाती थी।
इसी तरह मुगलों की सेना के द्वारा गांधार जो की वर्तमान में अफगानिस्तान है, वहां स्थित तक्षशिला विश्वविद्यालय का विध्वंश कर दिया गया। उसके बाद मुगल सेना आगे बढ़ती हुई कटासराज मंदिर भी पहुंची और यहाँ स्थित मंदिर, गुरुकुलों, कला क्षेत्र सभी को तहस-नहस करके रख दिया।
उन्होंने यहाँ पर हजारों लोगों की हत्या कर दी और स्त्रियों को अरब देशों में बेच दिया। इसके बाद से यहाँ से सभी विद्वानों, कलाकारों और संगीत प्रेमियों का पलायन शुरू हो गया और सभी अपनी जान बचाकर सिंध नदी के इस पार भारत देश में आ गए तो कुछ वहां से यूरोप चले गए जिनमें ज्यादातर संगीतकार थे।

कटासराज मंदिर की अनदेखी
भारतवर्ष से समय-समय पर कई प्रांत अलग होकर देश बने। इसके दो मुख्य कारण थे, एक बौद्ध धर्म का आवश्यकता से अधिक उत्थान और दूसरा इस्लामिक आक्रांताओं के कारण। लेकिन स्वतंत्रता के समय इस्लामिक कट्टरता और ब्रिटिश कूटनीति के कारण देश ने एक और विभाजन देखा जिसमें भारत से पाकिस्तान और बांग्लादेश (पहले पूर्वी पाकिस्तान) अलग हो गए।
1947 में जब भारत से कटकर पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र बन गया तब से इस मंदिर को वहां की सरकारों द्वारा अनदेखा किया गया और मुस्लिमों के द्वारा इसे क्षति पहुंचाई गई। इसका प्रमाण हम वर्तमान में भी वहां हो रहे मंदिरों पर हमले के रूप में देख सकते हैं।
मंदिर के कटाक्ष सरोवर का जल आसपास की फैक्ट्रीयों द्वारा प्रयोग किया जाने लगा जिस कारण 2 से 3 बार सरोवर सूखने की कगार पर आ पहुंचा था। इसी के साथ वहां स्वच्छता का कोई ध्यान नहीं रखा गया तथा वहां के स्थानीय लोगों के द्वारा सरोवर में गंदगी फैलाई गई। हिन्दुओं को भी मुश्किल से वहां जाने दिया जाता था। शिवरात्रि के अवसर पर ही हिंदू भगवान शिव का जलाभिषेक करने वहां जा पाते थे।
कटासराज मंदिर की सरंचना
कटासराज केवल एक मंदिर नहीं बल्कि कई मंदिरों की श्रृंखला है जिसमें से तीन मुख्य मंदिर हैं या ये भी कहा जा सकता है की ये तीन मंदिर थोड़ी सही स्थिति में हैं और बाकि तोड़े जा चुके हैं। इन तीन मंदिर भगवान शिव, श्रीराम और भक्त हनुमान के हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में कटाक्ष सरोवर और राजा हरि सिंह नलवा की हवेली हैं।
यहाँ के मंदिरों की स्थापत्य कला कश्मीरी हैं जिसमें मंदिर की छत शिखर से नुकीली होती है। मंदिरों को चौकोर आकर में बनाया गया हैं जिसमें सबसे बड़ा रामचंद्र मंदिर हैं। मंदिर की दीवारों और छत पर आकर्षक नक्काशियां और भित्तिचित्र देखने को मिलेंगे।
कैसे पहुंचे
पाकिस्तान के दर्शनीय स्थलों की यात्रा के लिए आप फ्लाइट, ट्रेन और बस में से किसी का भी चुनाव कर सकते हैं।



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