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अद्भुत : केरल के कोडुंगल्लूर भागीरथी मंदिर से जुड़ी अजीबोगरीब प्रथाएं

केरल राज्य का कोडुंगल्लूर भागीरथी मंदिर। Kodungallur Bhagavathy Temple in Kerala.

दक्षिण भारत अद्भुत मंदिरों का गढ़ माना जाता है, यहां के सभी राज्यों में मौजूद प्राचीन व आधुनिक युग के धार्मिक स्थल किसी न किसी पौराणिक मान्यता से जरूर जुड़े मिलेंगे। दक्षिण भारत का एक बड़ा हिन्दू समाज अपनी आस्था का प्रदर्शन पूरी सिद्धत के साथ करता है। जिसके जीते-जागते उदाहरण आप यहां के धार्मिक उत्सवों में देख सकते हैं।

कांचीपुरम, कोवलम, त्रिशूर आदि ये कुछ ऐसे स्थान हैं जहां असंख्य छोटे बड़े मंदिर मौजूद हैं। यहां के धार्मिक स्थल सिर्फ दैनिक पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनसे जुड़े हर-छोटे बड़े उत्सवों को बड़े स्तर पर मनाने की परंपरा है, जिसका अनुसरण स्थानीय लोगों द्वारा लंबे समय के किया जा रहा है।

यहां के धार्मिक रीति-रिवाज और मान्यताएं हिन्दू धर्म की जटिलताओं का चरितार्थ करते हैं। आज इस विशेष लेख में जानिए केरल के एक ऐसे मंदिर के बारे में जिससे जुड़े पारंपरिक त्योहार आपको दातों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर देंगे।

कोडुंगल्लूर देवी मंदिर

कोडुंगल्लूर देवी मंदिर

PC- Dinakarr

श्री कुरुम्बा भगवती मंदिर को कोडुंगल्लूर देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भारत के केरल राज्य के त्रिशूर जिले के कोडुंगल्लूर में स्थित यह मंदिर दक्षिण भारत सबसे अद्भुत मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर देवी भद्रकाली को समर्पित है जहां मां काली की पूजा की जाती है। यहां स्थानीय लोगों द्वारा देवी को कुरू्म्बा या कोडूंगल्लूर अम्मा के नाम से संबोधित किया जाता है।

केरल का यह मंदिर मालाबार में 64 श्रीकुरुम्बा कवों का प्रमुख है। मंदिर में स्थापित मूर्ति मां काली के प्रचंड रूप का प्रतिनिधित्व करती है। देवी के आठों हाथ भी अपनी खास विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं। एक राक्षस राजा दारुका का सिर, एक हाथ में तलवार, अगले में अंगूठी, एक और घंटी... इस तरह देवी के सभी हाथों में कुछ न कुछ मौजूद है। मंदिर में नियमित पूजा की जाती है।

एक संक्षिप्त इतिहास

एक संक्षिप्त इतिहास

PC- Sujithvv

कोडुंगल्लूर देवी को मां काली का मूल रूप माना जाता है। कोडुंगल्लूर कभी चेरा साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। जो उस दौरान एक महत्वपूर्ण नगर के रूप में उभरा। माना जाता है कि यह मंदिर केरल के एकदम मध्य में स्थित है, जिसे तमिल वक्ताओं द्वारा मलयाला भगवती के नाम से संबोधित किया जाता है। यह मंदिर काफी सालों पहले बनाया गया था, जिसकी पूजा संबधी रिवाजों में प्राचीन शक्तिम परंपराओं को शामिल किया गया है जो अन्य किसी केरल के मंदिर में देखने को नहीं मिलती।

इतिहास के पन्ने खंगालने से पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण चेरमान पेरुमल द्वारा किया गया था। कोडुंगल्लूर मंदिर में पहली शक्तिय पूजा मालाबार के थिय्यार द्वारा की गई थी। यहां तक कि आज भी 64 थारों की थिय्या थंडन (प्रशासनिक पद) कोडुंगल्लूर में मौजूद प्राचीन साक्ष्यों से पता चलता है।

धार्मिक मान्यताएं

धार्मिक मान्यताएं

PC- Sreeram Nambiar

प्राचीन काल के साक्ष्य बताते हैं कि मंदिर में पहले जानवरों की बलि देने की परंपरा थी। बलि अकसर पक्षियों और बकरी की दी जाती थी। भक्तों द्वारा संरक्षण की मांग और उनकी प्रार्थनाओं की पूर्ति के लिए इन बलिदानों का चलन था। हालांकि कोचीन सरकार के हस्तक्षेप के बाद अब यहां जानवरों की बली नहीं दी जाती । पशु-बली पर यहां प्रतिबंध लगा दिया गया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां धार्मिक अनुष्ठानों की समाप्ति हो गई है।

यहां मंदिर के भगवान को लाल धोती चढ़ाने की परंपरा है। इसके अलावा कई भक्त महंगे उपहार व सोने-चांदी भी देवी को समर्पित करते हैं। कोडुंगल्लूर के स्थानीय लोग मानते हैं कि प्राचीन समय में यह स्थान कभी भगवान शिव का मंदिर हुआ करता था और परशुराम ने शिव मंदिर के निकट देवी भद्रकाली की मूर्ति स्थापित की थी।

इसके अलावा लोगों का मानना है कि यहां की जाने वाली पूजा देवी मां के प्रत्यक्ष निर्देश के अनुसार की जाती है। इसके अलावा यहां पांच 'श्री चक्र' आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए गए हैं, जिन्हें इस देवी की शक्तियों का मुख्य स्रोत माना जाता है। यहां के पुजारी नंबूदिरीस और आदिकस होते हैं जिन्हें देवी को 'पुष्पांजलि अर्पित करने का अधिकार है।

भरानी त्यौहार

भरानी त्यौहार

PC- Sreeram Nambiar

कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर में आयोजित होने वाला भरानी त्यौहार केरल के प्रमुख त्यौहारों में गिना जाता है। जो साल के मार्च और अप्रैल महीनों के बीच मनाया जाता है। यह त्यौहार आम तौर पर 'कोझिकलकु मूडल' नामक एक अनुष्ठान से शुरू होता है जिसमें मुर्गों की बलि और उनके रक्त का बहाव शामिल होता हैं, जो इस त्योहार और मंदिर की खास विशेषता बनते हैं। इस अनुष्ठान को सिर्फ "कोडुंगल्लूर भगवती वेदू" के सदस्य की कर सकते हैं। इस धार्मिक रिवाज में देवी काली और उसके राक्षसों को प्रसन्न करना होता है जो रक्त प्रसाद से ही प्रसन्न होते हैं।

'कवू थेन्डल' त्यौहार का एक और प्रमुख भाग है। भद्रकली क्रांगनूर के शाही परिवार का संरक्षक बताई जाती है। इसमें कोडुंगल्लूर का राजा अपनी सक्रिय भूमिका निभाता है। बरगद के पेड़ के चारों ओर बने एक मंच पर खड़े होने पर रेशमी छतरी फैलाता है जिसके तुरंत बाद मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं। यह एक इशारा होता जिसके बाद कोई भी जाति का श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश कर देवी की पूजा कर सकता है। अनुष्ठान के दौरान दारूका राक्षक की हत्या का जश्न मनाया जाता है, जिसमें छड़ों का इस्तेमाल किया जाता है जो तलवार का प्रतीक मानी जाती है। प्राचीन समय में अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया जाता था।

वैलीचपैड अनुष्ठान के दौरान देव की तरह वस्त्र धारण कर श्रद्धालु मंदिर के चारों तरफ हाथों में छड़ लिए दौड़ लगाते हैं। छड़ क हवा में लहराते हुए यह अनुष्ठान पूरा किया जाता है। इस दौरान मंदिर के अंदर पूजा का सिलसिला जारी रहता है, श्रद्धा भाव से देवी की पूजा की जाती है। भक्त देवी की प्रतिमा पर रोते चिल्लाते हैं, जिसका अर्थ देवी से क्षमा प्रार्थना करना होता है। जिसके अगले दिन शुद्धिकरण समारोह का आयोजन किया जाता है।

कैसे करें प्रवेश

कैसे करें प्रवेश

PC- Sujithvv

कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर केरल राज्य के त्रिशूर जिले में स्थित है जहां आप तीनों मार्गों से पहुंच सकते हैं। यहां का नजदीकी हवाई अड्डा कोच्चि एयरपोर्ट है। रेलवे मार्ग के लिए आप कोडुंगल्लूर रेलवे स्टेशन का सहारा ले सकते हैं।

आप चाहें तो यहां सड़क मार्गों के माध्यम से भी पहुंच सकते हैं, बेहतर सड़क रूट्स से त्रिशूर दक्षिण भारत के कई बड़े शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

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