जरा सोचिए, कोलकाता से चेन्नई के बीच की लगभग 1668 किमी की दूरी, जिसे सड़क मार्ग से तय करने में लग जाता है कम से कम 29 घंटे का समय। लेकिन समुद्र मार्ग से इस दूरी को तय कर सकेंगे आप महज 3 घंटे में। और किराया लगेगा महज ₹600। लग रहा है न कोई चमत्कार जैसा! सिर्फ आप या हम ही नहीं, बल्कि...
महिंद्रा एंड महिंद्रा के निदेशक आनंद महिंद्रा भी हैरत में है। IIT मद्रास की इनक्यूबेशन सेल वाटरफ्लाई टेक्नोलॉजी (Waterfly Technologies) का इस्तेमाल कर बना रही है सी कार (Sea car)। इसे सी ग्लाइडर (Sea Glider) भी कहा जा रहा है।

आनंद महिंद्रा ने इस IIT मद्रास के इस स्टार्ट-अप की सराहना भी की है। साथ ही अपने बयान में उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है मानो IIT मद्रास सिलिकॉन वैली के साथ स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने में प्रतियोगिता कर रही है। अपने आधिकारिक X हैंडल पर आनंद महिंद्रा द्वारा किया गया यह पोस्ट लोगों का काफी ध्यान आकर्षित कर रहा है और वायरल भी हुआ है। अपने पोस्ट में उन्होंने जल मार्गों के नए विकल्प ढूंढने और इसके लिए शानदार वाहनों को डिजाइन की भी सराहना की है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लगभग 500 किमी प्रति घंटा की गति से न सिर्फ सी-कार या सी-ग्लाइडर को समुद्र की सतह पर फिसलाया जा सकता है बल्कि इसमें लगी पंखों की मदद से सी-कार समुद्र की सतह से करीब 4 मीटर की ऊंचाई पर उड़ भी सकता है। बताया जाता है कि कोलकाता से चेन्नई के बीच की लगभग 1600 किमी की दूरी का किराया अगर मात्र ₹600 प्रति सीट होता है, तो यह ट्रेन के एसी 3 टियर की टिकट से भी सस्ता होगा।
सी-ग्लाइडर का निर्माण कर रही कंपनी के सह-संस्थापक केशव चौधरी के हवाले से News18 की मीडिया रिपोर्ट में बताया जाता है कि यह एक विशेष तरह का डिजाइन किया हुआ विमान होगा, जो समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भरेगा। उन्होंने बताया कि सी-कार के पंखों पर घर्षण कम होने और वायु कुशनिंग के कारण लिफ्ट बढ़ जाएगी, जिससे गति कम होने पर भी यह उड़ान भरने में सक्षम होगी।
उदाहरण के तौर पर, कोलकाता से चेन्नई के बीच एक सामान्य विमान एयरबस A320 को उड़ान भरने के लिए कम से कम 2.5 से 3 टन एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की जरूरत होती है, जिसकी वर्तमान कीमत लगभग ₹95,000 प्रति किलोलिटर है। लेकिन सी-ग्लाइडर ईंधन के इस खर्च को काफी हद तक कम कर देगी, जिसकी वजह से किराया भी कम किया जा सकेगा।
साथ ही केशव चौधरी का कहना है कि सी-कार की उत्पादन लागत भी किसी सामान्य विमान की तुलना में काफी कम है। उन्होंने कहा कि यह काफी ऊंचाई पर नहीं उड़ता है, इसलिए इसे हवा के कम दबाव को नहीं झेलना पड़ता है। जिस वजह से इसे काफी ज्यादा मजबूत बनाने की जरूरत भी नहीं होती जो इसका उत्पादन लागत कम कर देता है।
समुद्र के ऊपर उड़ने का एक बड़ा फायदा यह भी है कि किसी विमान को रन के आखिरी छोर से उड़ान भरना पड़ता है लेकिन सी-ग्लाइडर या सी-कार के लिए पूरा समुद्र ही रनवे है। सी-कार के लिए रनवे का कोई अंत ही नहीं है, इसलिए इंजन पर अतिरिक्त दबाव डालकर उड़ान भरने की जरूरत नहीं होती है।

कितना आगे बढ़ा है काम?
मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार यह परियोजना अभी अपने शुरुआती चरण में ही है। एयरो इंडिया में कंपनी ने सिर्फ इसका डिजाइन प्रस्तुत किया था। इसका पहला प्रोटोटाइप जिसका वजह करीब 100 किलो होगा, के बारे में संभावना जतायी जा रही है कि अगले कुछ महीनों में इसे तैयार कर लिया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि साल 2025 के अंत तक 1 टन वजनी प्रोटोटाइप उड़ान भरने के लिए तैयार होगा।
कंपनी ने साल 2026 तक 20 सीटों वाला मॉडल का निर्माण करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो चेन्नई से कोलकाता के बीच उड़ान भरेगी। बताया जाता है कि शुरुआती दौर में IIT मद्रास ने इसका निर्माण कर रही कंपनी को वित्तीय मदद पहुंचायी है। लेकिन कंपनी अब दूसरे सेक्टरों से भी वित्तीय सहायता जुटाने की कोशिश कर रही है। संभावना जतायी जा रही है कि भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल कर कार्गो शिपिंग या निगरानी अभियान भी चलाए जा सकते हैं।



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