कुछ समय पहले भारत के जिस द्वीप समूह लक्षद्वीप को लेकर सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ हंगामा मचा हुआ था। मालद्वीप को लेकर जिस लक्षद्वीप का तुलनात्मक विवाद सूर्खियों में छाया हुआ था, अगर कुछ पलों की देरी और हो जाती तो क्या आप जानते हैं वह पाकिस्तान का हिस्सा बन जाता।
जी हां, भारत के इस शानदार द्वीप पर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ने भी अपना दावा किया था। लेकिन भारत ने कुछ ऐसा किया कि पूरा पासा ही पलट गया और पाकिस्तान बस खड़ा देखता रह गया।

लक्षद्वीप को भारत में शामिल करवाने का पूरा श्रेय एक गुजराती को जाता है। लक्षद्वीप को भारत में शामिल करवाने का श्रेय सरदार बल्लभ भाई पटेल को जाता है। जी हां, ये वहीं बल्लभ भाई पटेल हैं, जिनको समर्पित करते हुए गुजरात के केवड़िया में विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' स्थापित की गयी है।
लेकिन क्या आप जानते हैं, हैदराबाद, जूनागढ़ जैसी जगहों की तरह ही लक्षद्वीप पर भी पाकिस्तान अपनी नज़रे गड़ाए हुए था। यह कहानी वर्ष 1947 की है, जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ था।
बंटवारे की त्रासदी का वर्णन शब्दों में कर पाना संभव नहीं है। जिस समय भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब कोच्चि से 450 किमी दूर स्थित लक्षद्वीप एक छोटा लेकिन मुस्लिम बहुल इलाका था। कहा जाता है कि उस समय लक्षद्वीप की कुल आबादी का 93% हिस्सा मुसलमान ही थे।
जब जिन्ना को इस बारे में जानकारी मिली तो पाकिस्तान भी इस खूबसूरत द्वीप पर कब्जा जमाने की कोशिश करने लगा। लेकिन सरदार बल्लभ भाई पटेल के एक फैसले ने पूरा पासा पलट दिया और पाकिस्तान को खाली हाथ वापस लौट जाना पड़ा।

क्या था वह फैसला जिसने बदल दिया सारा खेल
मोहम्मद अली जिन्ना ने लक्षद्वीप को पाकिस्तान में शामिल करने के लिए कराची से पाकिस्तान का एक झंडा लेकर युद्धपोत को समुद्र के रास्ते लक्षद्वीप के लिए रवाना किया। इस बात की जानकारी जैसे ही सरदार बल्लभ भाई पटेल को मिली तो उन्होंने दो तमिल भाईयों, अर्कोट रामास्वामी मुदालियार और अर्कोट लक्ष्मण स्वामी मुदालियार से आग्रह किया कि वो त्रावणकोर के कुछ लोगों को लेकर तुरंत लक्षद्वीप के लिए रवाना हो जाएं।
सरदार पटेल का निर्देश मिलते ही दोनों भारत के त्रावणकोर से भारत का झंडा लेकर एक युद्धपोत में लक्षद्वीप के लिए रवाना हो गये। जब पाकिस्तान का युद्धपोत लक्षद्वीप पहुंचा तो...

जब लक्षद्वीप में पाकिस्तान का युद्धपोत पहुंचा तो उन्हें पता चला कि 30 मिनट पहले ही भारत ने अपना झंडा लक्षद्वीप पर फहरा दिया है। बस फिर क्या था, पाकिस्तान के युद्धपोत को खाली हाथ वापस लौट जाना पड़ा। अगर भारत को 30 मिनट देर हो जाती तो आज लक्षद्वीप जैसा सुन्दर सा द्वीप भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान का हिस्सा बन जाता।
बता दें, अर्कोट रामास्वामी मुदालियार मैसूर के 24वें और अंतिम दीवान थे। वहीं उनके भाई अर्कोट लक्ष्मण स्वामी मुदालियार एक चिकित्सक और मद्रास विश्वविद्यालय में 20 सालों तक कुलपति रह चुके थे।



Click it and Unblock the Notifications














