भारत के लगभग हर राज्य में कोई न किला ऐसा है, जो अपने आप में कई रहस्यों को समाए हुए है। ऐसा ही एक किला है मध्य प्रदेश में भोपाल से लगभग 50 किमी दूर स्थित रायसेन किला। इस किले ने चुपचाप न जाने कितनी सांसों की टूटती डोर को देखा है। इसी किले में कभी एक साथ अपनी रानी समेत 700 राजपूती महिलाओं ने जौहर किया था तो कभी किसी राजा ने अपने ही हाथों से अपनी रानी का गला काट डाला था।
रायसेन किले पर कई राजाओं और मुगल शासकों का अधिकार रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस किले का निर्माण 10वीं सदी में परमार वंश के राजा राज सिंह ने करवाया था।
किले को जीतने में छुटे थे शेरशाह के पसीने

बलुआ पत्थर से निर्मित रायसेन के किला का इतिहास बड़ा ही शानदार रहा है। जिन राजाओं ने इस किले पर राज किया था, उनमें शेरशाह सूरी भी शामिल था। 9 द्वार और 13 बुर्ज वाले इस किले को जीतने में शेरशाह सूरी के पसीने छुट गये थे। यह एक पहाड़ी किला है जिसका निर्माण बलुआ पत्थरों से किया गया है। 1532 में इसी किले में भगवान शिव को साक्षी मानकर रानी दुर्गावती ने किले की 700 राजपूती महिलाओं व बच्चों समेत जौहर कुंड में प्रवेश कर लिया था। रायसेन किले में रानी दुर्गावती के जौहर की कहानियाँ आज भी स्थानीय लोग सुनाते रहते हैं।
राजा को मिला धोखा

वर्ष 1532 में इस किले पर राजा शिलादित्य का शासन था। उनका विवाह मेवाड़ के राणा सांगा की बेटी दुर्गावती के साथ हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक गुजरात के शासक बहादुर शाह द्वितीय की वर्ष 1531 में राजा शिलादित्य से संधि हो चुकी थी। उस समय उज्जैन, रायसेन और विदिशा जैसे क्षेत्र शिलादित्य के अधिकार में ही थे।
शेरशाह सूरी जब रायसेन पर अपना अधिकार करने की कोशिश कर रहा था, तब बहादुर शाह द्वितीय ने शिलादित्य को धोखा दिया और उसे सहयोगियों समेत मांडू में बंदी बना लिया। इधर रायसेन का किला रानी दुर्गावती और शिलादित्य के भाई लक्ष्मण राय की देखरेख में था। उस समय शिलादित्य का बेटा भूपति राय एक युद्ध अभियान पर था।
रानी ने चालाकी से लिया काम

भूपति राय से बहादुर शाह द्वितीय काफी भयभीत रहता था। जैसे ही उसे रायसेन किले पर चढ़ाई की जानकारी मिली, वह वापस रायसेन लौट पड़ा। इधर रानी दुर्गावती ने भी चालाकी से काम लिया। उन्होंने बहादुर शाह द्वितीय को कहलवाया कि अगर राजा शिलादित्य अपनी सहमति से किला छोड़कर गये हैं तो उनसे कहा जाए कि वह किले में आकर रानी से बात करें।
भूपति राय के वापस लौटने की खबर से घबराया बहादुर शाह द्वितीय ने शिलादित्य को वापस किले में पहुंचा दिया। रानी दुर्गावती ने तब शिलादित्य से कहा कि हमारी हार निश्चित है। इसलिए किले की सभी राजपूती महिलाओं ने मुगलों के आगे झुकने के बजाए जौहर करने का फैसला लिया है। हुआ भी यहीं, रानी दुर्गावती ने 700 राजपूती महिलाओं समेत जौहर किया और शिलादित्य अपनी अंतिम सांस तक युद्ध लड़ते रहे। इस बात के सबूत रायसेन के गजेटियर में भी मिलते हैं।
राजा ने खुद अपनी रानी का सिर किया कलम

जिस समय शेरशाह सूरी ने इस किले को जीता था, तब इस किले पर राजा पूरणमल का शासन था। 'तारीखे शेरशाही' के अनुसार 4 महीनों तक लगातार घेराबंदी के बाद भी वह इस किले को जीतने में कामयाब नहीं हो सका था। कहा जाता है कि जब शेरशाह के पास हथियारों की कमी होने लगी तो उसने चांदी के सिक्कों को गलाकर उनसे तोप बनवाएं। तब वह इस किले को जीतने में सफल हो सका।
बताया जाता है कि वर्ष 1543 में शेरशाह सूरी ने धोखे से यह किला जीता था। जैसे ही राजा पूरणमल को शेरशाह सूरी द्वारा किले पर जीत हासिल कर लेने की जानकारी मिली, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी रानी रत्नावली का सिर काट डाला। ऐसा उन्होंने अपनी रानी को मुगल शासकों से बचाने के लिए किया था।
कहा जाता है कि किसी जमाने में यहां शासन करने वाले राजा रायसेन के पास एक पारस पत्थर हुआ करता था। उस पत्थर को हासिल करने के लिए भी उन्हें कई लड़ाईयां लड़नी पड़ी थी। जब युद्ध में राजा रायसेन हार गये तो उन्होंने पारस पत्थर पर किले की एक तालाब में फेंक दिया। हालांकि पुरातत्व विभाग को कभी भी कोई ऐसा सबुत नहीं मिला, जिससे किले में पारस पत्थर की मौजूदगी की पुष्टि हो सकें। लेकिन आज भी लोग चोरी-छिपे इस किले में पारस पत्थर की तलाश में जाते रहते हैं।



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