भारत के एक हिस्से में जब कोई त्योहार या उत्सव खत्म होता है, ठीक उसी समय किसी दूसरे हिस्से में उत्सव मनाने की तैयारियां शुरू हो जाती है। भारत की इतनी विविधता ही उसकी सबसे बड़ी खासियत है जिससे आकर्षित होकर लाखों की संख्या में विदेश पर्यटक विभिन्न त्योहारों और उत्सवों में शामिल होने भारत आते हैं।
उत्तर भारत में जहां अभी भी लोगों के सिर पर होली का खुमार छाया हुआ है, वहीं दक्षिण भारत के तमिलनाडु में प्रमुख चिथिरई उत्सव की तैयारियां जोरोशोरों से शुरू कर दी गयी है।

चिथिरई उत्सव तमिलनाडु के मदुरै का प्रमुख त्योहार है। यह एक धार्मिक उत्सव है जो मदुरै में बड़े ही धुमधाम से हर कई दिनों तक मनाया जाता है। चिथिरई उत्सव में कई तरह के अलग-अलग धार्मिक कार्यक्रम मनाए जाते हैं।
मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में आयोजित होने वाले इस उत्सव में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के अलावा देश के दूसरे राज्यों से भी वाले लोग और विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं। इस साल चिथिरई उत्सवों की शुरुआत 12 अप्रैल से हो रही है।

चिथिरई उत्सव की शुरुआत मीनाक्षी अम्मन मंदिर में ध्वजारोहण के साथ होती है। लगभग 1 महीने तक चलने वाले इस उत्सव के शुरुआती 15 दिन विभिन्न नियमों और परंपराओं का पालन किया जाता है। इन 15 दिनों के दौरान देवी मीनाक्षी का राज्याभिषेक और सुन्दरेश्वर से उनका कल्याणम (विवाह) आयोजित होता है। मान्यतानुसार देवी मीनाक्षी माता पार्वती और सुन्दरेश्वर महादेव का ही स्वरूप है।

कहा जाता है कि अपनी बहन मीनाक्षी की शादी में शामिल होने के लिए भगवान कल्लाज्हागा (भगवान विष्णु के अवतार) सोने के घोड़े पर सवार होकर आए थे। इस तरह से पुराने जमाने में यह उत्सव शैव और वैष्णव संप्रदायों का एकसाथ मिलकर मनाया जाने वाला उत्सव था।

चिथिरई उत्सव के अगले 15 दिनों तक भगवान कल्लाज्हागा को अल्गर कोयील मंदिर से मदुरै में वापस लाने का जुलूस और उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पारंपरिक रूप से चिथिरई उत्सव का समापन वैगई नदी के तट पर पूजा और अन्य नियमों का पालन करने के साथ होता है। हर दिन अहले सुबह 9 या फिर उससे भी पहले से पूजा-पाठ और सभी परंपराओं का पालन शुरू हो जाता है। ऐसा उत्सव के हर दिन होता है, जो रात को 9-10 बजे तक जारी रहता है।



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