Search
  • Follow NativePlanet
Share
» »महाराष्ट्र के इन 8 गांवों में स्थापित हैं स्वयंभू 'अष्टविनायक' गणपति

महाराष्ट्र के इन 8 गांवों में स्थापित हैं स्वयंभू 'अष्टविनायक' गणपति

पूरे भारतवर्ष को जिस त्योहार, गणेश चतुर्थी, का बेसब्री से इंतजार होता है, वह इसी महीने में मनाया जाएगा। यूं तो देशभर में सिर्फ एक दिन ही विघ्नहर्ता गणपति की पूजा की जाती है लेकिन महाराष्ट्र में यह त्योहार पूरे 10 दिनों तक चलता है। इस साल घरों में गौरीपुत्र गणेश की स्थापना 19 सितंबर को होगी और 28 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन बाप्पा का विसर्जन किया जाएगा।

ganapati

इस साल गणेशोत्सव को थोड़ा अलग अंदाज में मनाते हैं और महाराष्ट्र के ही 8 गांवों में मौजूद अष्टविनायक की यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

सबसे पहले बताते हैं कि गणेश चतुर्थी क्यों मनायी जाती है?

गणेश चतुर्थी के दिन गौरी पुत्र गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाता है। लेकिन इस 10 दिनों तक मनाने का क्या औचित्य है? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब महर्षी वेदव्यास ने महाभारत की रचना करने का निर्णय लिया तो उन्होंने इसे लिपिबद्ध करने के लिए भगवान गणेश का आह्वान किया। 10 दिनों तक महर्षी वेदव्यास सम्पूर्ण महाभारत को श्लोकों में सुनाते रहे और भगवान गणेश उसे बिना रुके लिखते गये। कहा जाता है कि इसी दौरान भगवान गणेश की कलम भी टूट गयी।

लेकिन महर्षी वेदव्यास द्वारा सुनाये जा रहे श्लोक लिखने में देर ना हो जाए इसलिए उन्होंने अपना एक दांत तोड़कर उसे ही दवात की स्याही में डूबोकर कलम की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 10 दिनों तक लगातार लिखने के बाद जब महाभारत संपूर्ण हुई तब तक गणपति पर मिट्टी की मोटी परत जम गयी थी। तब अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश ने सरस्वती नदी में स्नान किया था। इसके बाद से ही 10 दिनों तक गणेश चतुर्थी मनाया जाने लगा।

कहां-कहां है स्वयंभू अष्टविनायक के मंदिर

ashtavinayaka

1. मयूरेश्वर अष्टविनायक मंदिर

पुणे से लगभग 80 किमी की दूरी पर मौजूद है मयूरेश्वर मंदिर है। मंदिर में भगवान गणेश की बैठी हुई मुद्रा में मूर्ति है, जिसकी सूंड बाई ओर घुमी हुई है। भगवान गणेश की 4 भुजाएं और 3 नेत्र हैं। मंदिर के 4 द्वार हैं जो चारों युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलयुग का प्रतीक हैं। इस मंदिर की वास्तुकला कुछ ऐसी है कि दूर से देखने पर यह एक मस्जिद की तरह दिखाई देती है।

संभवतः इसी वजह से मुगलों ने इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश ने मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर नामक एक राक्षश से युद्ध किया था और उसका वध किया था। इसी वजह से इसे मयूरेश्वर कहा जाता है। आमतौर पर भगवान शिव के मंदिर के सामने नंदी की मूर्ति स्थापित होती है लेकिन मयूरेश्वर विनायक मंदिर के सामने भी नंदी की मूर्ति विराजमान है।

2. गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर

पुणे से लगभग 90 किमी की दूरी पर स्थित है लेण्याद्री गांव। इसी गांव में गिराजात्मज अष्टविनायक मंदिर स्थित है जिसका अर्थ है गिरिजा के आत्मज यानी पुत्र। यह मंदिर लेणयाद्री पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के बीच में बना हुआ है। इस पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं, जिसमें से 8वीं गुफा में गिरिजात्मज विनायक का मंदिर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 300 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खास बात है कि पूरे मंदिर को एक विशाल पत्थर को काट कर बनाया गया है। मंदिर में बिजली की व्यवस्था नहीं है लेकिन इसे ऐसे बनाया गया है कि मंदिर के अंदर दिन का उजाला बना रहता है।

3. सिद्धिविनायक

पुणे से करीब 200 किमी की दूरी पर करजत तहसील के अहमदनगर में स्थित है सिद्धिविनायक का मंदिर। बताया जाता है कि यह मंदिर लगभग 200 साल पुराना है, जिसका निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है। इस मंदिर की परिक्रमा करने के लिए पहाड़ की यात्रा करनी पड़ती है। मंदिर में भगवान गणेश की 3 फीट ऊंची मूर्ति स्थापित है। यहां भगवान गणेश का सूंड दाईं ओर मुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सिद्धटेक की भूमि पर भगवान विष्णु ने गणपति से वरदान प्राप्त कर दो राक्षशों का वध किया था।

4. बल्लालेश्वर अष्टविनायक

मुंबई-पुणे हाईवे पर नागोथाने से 11 किमी की दूरी पर बल्लालेश्वर अष्टविनायक का मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का नाम भगवान गणेश के भक्त बल्लाल के नाम पर रखा गया है। कहा जाता है कि भगवान गणेश के इस भक्त को गणेश की आराधना करने के कारण परिवार समेत जंगल में फेंक दिया गया था। जहां वह अपना समय भगवान गणेश की उपासना में ही व्यतित करते थे। इससे प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उन्हें इस स्थान पर दर्शन दिया था और कालांतर में बल्लालेश्वर अष्टविनायक के नाम से उनका मंदिर भी इसी स्थान पर बनाया गया।

ganesh 1

5. विघ्नेश्वर अष्टविनायक

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के नाम से भी पूजा जाता है। पुणे-नासिक रोड पर करीब 85 किमी की दूरी पर यह मंदिर ओझर जिले के जूनर क्षेत्र में स्थित है। मान्यता के अनुसार एक बार विघ्नासुर नामक एक असुर संतों को काफी परेशान कर रहा था। तब भगवान गणेश ने उसका इस स्थान पर अंत किया था। उसी समय से भगवान गणेश विघ्नेश्वर अष्टविनायक के नाम से इस स्थान पर स्थापित हुए और पूजे जाते हैं।

6. वरदविनायक

कोल्हापुर में मौजूद है वरदविनायक का मंदिर। जिसका अर्थ होता है इनाम या सफलता देने वाला। वरदविनायक की मूर्ति की सूंड दाईं ओर घुमी हुई है। कहा जाता है कि धोंडू पौडकर ने 1690 में इस मूर्ति को पास की एक नदी में पाया था। मूर्ति आधी विसर्जित थी। इसलिए इस मंदिर में प्रतिमा का आकार थोड़ा परिवर्तित है। 1725 में रामजी बीवलकर ने इसे मंदिर में स्थापित किया। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर के अंदर नंददीप नाम का एक दीपक है पिछले कई सालों से लगातार जल रहा है।

7. चिंतामणी अष्टविनायक

महाराष्ट्र के थेऊर गांव में तीन नदियों भीम, मुला और मुथा के संगम स्थल पर स्थित है चिंतामणी अष्टविनायक का मंदिर। इस मंदिर में भगवान की मूर्ति पूर्व की ओर और मंदिर का द्वार उत्तर की ओर है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश ने ऋषि कपिला के लिए असुरों से चिंतामणि नामक मणि वापस लाया था। इससे प्रसन्न होकर ऋषि ने भगवान गणेश को 2 हीरे भेंट स्वरूप दिये थे जो आज भी मूर्ति की सूंड पर टिकी हुई है। बताया जाता है कि यह घटना कदंब के एक पेड़ के नीचे घटित हुई थी। इसलिए पुराने जमाने में इस गांव को कदंब नगर भी कहा जाता था।

8. महागणपति

महाराष्ट्र के राजणगांव में स्‍थित है महागणपति मंदिर। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 9-10वीं सदी के बीच किया गया था। कहा जाता है कि यहां भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना स्वयं महादेव ने की थी। जब भगवान शिव दावन त्रिपुरासुर से लड़ने निकले तब उन्होंने यहां प्रथम पूज्य भगवान गणेश के दर्शन किये थे। मंदिर के पूर्व दिशा की ओर विशाल और सुन्दर प्रवेश द्वार है। यहां गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर में भगवान गणेश के साथ उनकी पत्नियां रिद्धी और सिद्धी भी बैठी हुई हैं। कहा जाता है कि विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करने के लिए उस समय मंदिर की मूल मूर्ति को तहखाने में छिपा दिया गया है। स्थानीय लोगों की धारणा है कि वास्तविक मूर्ति में भगवान गणेश की 20 भुजाएं हैं। पुराने जमाने में इस गांव को महाद कहा जाता था।

FAQs
अष्टविनायक के मंदिर कितने जिलों में है?

अष्टविनायक मंदिर महाराष्ट्र के 6 जिलों में और रायगढ़ जिले में 2 मंदिर हैं।

अष्टविनायक की यात्रा में कितने दिनों का समय लगता है?

अष्टविनायक के मंदिर 8 गांवों में फैले हुए हैं। मान्यता के अनुसार मयूरेश्वर से यह यात्रा शुरू होती है जो राजणगांव में महागणपति मंदिर के दर्शन पर खत्म होती है। इस पूरी यात्रा को करने में 2 से 3 दिनों का समय लग सकता है।

अष्टविनायक क्या है?

महाराष्ट्र के 8 गांवों में भगवान गणेश के 8 स्वयंभू मंदिर हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान गणेश की मूर्ति को किसी इंसान ने नहीं बल्कि भगवान यहां खुद से उत्पन्न हुए हैं। इसलिए देशभर में भगवान गणेश के माननेवालों में अष्टविनायक का काफी ज्यादा महत्व है।

NativePlanet Travel

More News

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+