महाराष्ट्र में नागपुर के पास एक ऐसा किला मौजूद है , जो वास्तव में एक किला ना होकर एक मंदिर है। वो भी कोई सामान्य सा मंदिर नहीं, बल्कि कहा जाता है कि इस स्थान पर ही माता सीता ने अपनी पहली रसोई बनायी थी जिसका आनंद उस वक्त इस क्षेत्र में रहने वाले ऋषि-मुनियों ने लिया था। अगर आप गणेश चतुर्थी के समय पुणे के दगड़ू सेठ हलवाई मंदिर में भगवान गणपति के दर्शन करने जाने का प्लान बना रहे हैं तो...

अपने ट्रिप को थोड़ा सा और बढ़ाइए और पुणे से 40 किमी दूर इस किले में स्थित मंदिर के भी दर्शन करने जरूर आएं। बता दें, इस मंदिर का संबंध भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के वनवासकाल से रहा है।
बेहद खास है यह किला
नागपुर के पास स्थित रामटेक किला एक छोटी से बना हुआ है। इसे स्थानीय लोग गढ़ मंदिर या सिंदुर गिरी के नाम से भी जानते हैं। इस किलानुमा मंदिर का निर्माण राजा रघु खोंले ने करवाया था। दूर से देखने पर यह मंदिर एक किला की तरह ही दिखाई देता है। कहा जाता है कि इस किले के निर्माण में किसी भी प्रकार के रेत का इस्तेमाल नहीं किया गया था। इसे सिर्फ पत्थरों के ऊपर पत्थर रखकर ही तैयार किया गया।

लेकिन हैरान करने वाली बात है कि सदियों पुराना यह किला ना जाने कितनी तूफानों और मौसम की मार झेल चुका है लेकिन इसका एक भी पत्थर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। स्थानीय लोग इसे भगवान राम का प्रताप मानते हैं।
श्रीराम के वनवास से है संबंधित
रामटेक किला भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास से संबंधित है। कहा जाता है कि अपने वनवास काल के दौरान भगवान राम ने माता सीता और लक्ष्मण समेत इस स्थान पर करीब 4 महीनों का समय बिताया था। यानी इस जगह पर भगवान राम 'टिक' गये थे, इसलिए इस स्थान का नाम रामटेक पड़ गया। इसी जगह पर माता सीता ने अपनी पहली रसोई बनायी थी और उस समय यहां मौजूद ऋषियों को भोजन करवाया था। इस बात का उल्लेख पद्मपुराण में मिलता है। इसी जगह पर भगवान राम की मुलाकार अगस्त्य ऋषि से हुई थी, जिन्होंने रावण के आतंक और असुरों के अत्याचारों के बारे में भगवान राम को बताया था।

बता दें, ऋषि अग्स्त्य लंकेश रावण के चचेरे भाई थे। श्रीराम ने जब यहां पड़ी हड्डियों के ढांचे के बारे में ऋषि अगस्त्य से पूछा तो उन्होंने रावण और उसके शस्त्रों के बारे में श्रीराम को विस्तार से बताया था। अगस्त्य ऋषि द्वारा प्रदान किये हुए ब्रह्मास्त्र से ही भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। बताया जाता है कि रामटेक की वह स्थान है, जहां कालीदास ने अपने महाकाव्य मेघदूत की रचना की थी। लेकिन उस समय इस जगह को रामगिरी के नाम से जाना जाता था। बाद में इस स्थान का नाम बदलकर रामटेक हो गया। रामगिरी का अर्थ, वह स्थान होता है जहां भगवान राम रुके थे।
बिजली चमकती है तो दिखते हैं प्रभु श्रीराम

रामटेक किला ऐसा स्थान है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान श्रीराम स्वयं दर्शन देने आते हैं। दावा किया जाता है कि बारिश के समय जब मंदिर के ऊपर बिजली चमकती है तो मंदिर के शिखर पर भी एक ज्योति चमकती है जिसमें भगवान श्रीराम का चेहरा नजर आता है। इस मंदिर परिसर में एक तालाब स्थित है, जिसका पानी लोगों को हैरत में डाल देता है। कहा जाता है कि यहां कितना भी सुखा पड़े या कितनी भी बारिश हो जाए, लेकिन कभी भी इस तालाब के जलस्तर में कोई परिवर्तन नहीं होता है। इस तालाब का जलस्तर हमेशा एक जैसा ही बना रहता है।



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