आपने अपने जीवन में ये पंक्तियां कई बार सुनी होंगी - "सत्य ही शिव है शिव ही सुन्दर है"जी हां जो सत्य है वोही शिव है और जो शिव है वोही सुन्दर है। हो सकता है इन लाइनों को पढ़ने के बाद आपके मन में एक छोटा सा सवाल उठे कि ट्रेवल और टूरिज्म की बात बताने वाले हम लोग आज अचानक आध्यात्मिक कैसे हो गए ? तो आपको बताते चलें कि जल्द ही शिवरात्रि आने वाली है और हम आपको आपकी कंप्यूटर, मोबाइल और टैब की स्क्रीन पर ही भोले बाबा के दर्शन कराने वाले हैं। आगे बढ़ने से पहले आइये आपको अवगत करा दें शिवरात्रि के इतिहास से। पढ़ें : कहां कहां हैं नीलकंठ,भगवान शिव को समर्पित ज्योतिर्लिंग
महाशिवरात्रि का शुमार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में होता है जिसे भगवान शिव से सम्बंधित प्रमुख पर्वों में गिना जाता है। ज्ञात हो कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं।

इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। इस दिन शिवभक्त, शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन करते, उपवास करते तथा रात्रि को जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है। तो आइये महाशिवरात्रि के उपलक्ष में हम आपको अवगत कराते हैं अलग अलग शिव मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों से।
अपनी इस सीरीज में आज हम बात करेंगे देवघर स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग से। वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग झारखंड राज्य के देवघर में है जिसे " बाबा धाम" के नाम से भी जाना जाता है । एक प्रमुख हिन्दू तीर्थ होने के कारण यहां मुखय वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के अलावा 21 अन्य मंदिर हैं। आपको बता दें कि यहां मौजूद वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को 51 शक्ति पीठों में भी शामिल किया गया है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस कारण इस लिंग को "कामना लिंग" भी कहा जाता हैं।

मंदिर का इतिहास
ये शिवलिंग यहां कैसे आया इसका इतिहास भी बड़ा रोचक है। कहा जाता है कि रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा माँगी।
शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा, और यहां यही हुआ रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक अहीर को थमा लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया।
इधर उस अहीर से उसे बहुत अधिक भारी अनुभव कर भूमि पर रख दिया। फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अँगूठा गड़ाकर लंका को चला गया।
कैसे जाएं वैद्यनाथ धाम
सड़क द्वारा - देवघर आने के लिए आपको भारत के सभी प्रमुख शहरों से बसें मिल जाएंगी। यहां से कोलकाता (373 किलोमीटर),पटना (281 किलोमीटर), दुमका (67 किलोमीटर), गिरिडीह (किलोमीटर), मधुपुर (57 किलोमीटर) और शिमूलतला (53किलोमीटर) की दूरी पर स्थित हैं।
रेल द्वारा - वैद्यनाथ धाम का निकटतम रेलवे स्टेशन देवघर हैं जो धाम से 7 किलोमीटर दूर है। देश के सभी प्रमुख शहरों से यहां आने के लिए आपको ट्रेन मिल जायगी।
एयर द्वारा - देवघर का निकटतम हवाई अड्डा पटना में है जो देवघर से 281 किलोमीटर की दूरी पर है और देश के सभी प्रमुख एयर पोर्टों से यहां आने के लिए फ्लाइट उपलब्ध हैं।
आप अपने जीवन में अवश्य ही एक बार यहां आइये और कोई भी मन्नत मांगिये भोले बाबा अवश्य ही आपकी मनोकामना को पूरा करेंगे।



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