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» »रंगों ने बदल डाली मुंबई के इस स्लम की काया, इटली के पोजितानो से हो रही है तुलना

रंगों ने बदल डाली मुंबई के इस स्लम की काया, इटली के पोजितानो से हो रही है तुलना

A Mumbai Slum near ghatkopar became the center of attarction for the people. People are now comparing with the village of Italy Positano/ मुंबई, घाटकोपर के पास 'असल्फा स्लम' लोगों के लिए आकर्षण का कें

'स्लम' का नाम आते ही हमारे दिमाग में दूर-दूर तक फैली गंदगी, झुग्गियों से निकलते अर्धनग्न कुपोषित बच्चों की दर्दनाक छवि उभर कर सामने आती है। इस काल्पनिक छवि का जीवंत दृष्टांत तब नजर आता है, जब बात मुंबई की मलिन बस्तियों की चल रही हो। इसमें कोई दो राय नहीं, कि मुंबई भीड़ भरे मेट्रो शहरों के साथ, झुग्गियों वाले तंग इलाकों के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है। धारावी, घाटकोपर, मानखुर्द कुछ ऐसे ही स्लम इलाके हैं, जिन्हें मुंबई की खूबसूरती पर 'काला धब्बा' भी कहा जाता है, जिनके जमीनी विकास पर सरकार हमेशा पल्ला झाड़ते ही नजर आती है।

मुंबई का स्लम बना इटली का पोजितानो

मुंबई का स्लम बना इटली का पोजितानो

PC-Annwvyn

ऐसा हरगिज नहीं है कि यहां के बाशिंदे इन्हीं तंग गलियों के आदि हो चुके हैं, आज हम आपको मुंबई की इन्हीं मलिन बस्तियों से निकलती, एक ऐसी खबर से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो इस वक्त राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है, इस खबर को जानने के बाद मुंबई घूमने आए देश-विदेश के पर्यटक यहां खिंचे चले आ रहे हैं। इस वक्त मुंबई के पास 'असल्फा स्लम' लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो इस स्लम की खूबसूरती की तुलना, इटली के एक खूबसूरत गांव 'पोजितानों' से की जा रही है।

विश्वास करना मुश्किल

विश्वास करना मुश्किल

PC-Sankarshansen

खबरों की मानें तो इस स्लम की दीवारों को देख, यह विश्वास करना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है कि यह कोई मलिन बस्तियों से भरा इलाका है। अपने भ्रम को दूर करने के लिए यहां लोगों का तांता लगा हुआ है। जिसे पर्यटन की दृष्टि से एक अच्छी पहल माना जा रहा है।

'चल रंग दे'

'चल रंग दे'

PC-Marcus Fornell

यह बात किसी को भी हैरत में डाल सकती है, कि मुंबई के इस स्लम की रातों-रात काया पलट किसने कर दी ? बता दें कि भले ही सरकार इस मामले में अपनी आंखे बंद रखे है, पर मुंबई में कई ऐसे एनजीओ हैं जो बिना नाम व पैसों की ख्वाहिश लिए मानव जीवन को बेहतर बनाने में अपना सहयोग लंबे समय से दे रहे हैं। इसी क्रम में 'चल रंग दे' नामक गैर सरकारी संगठन ने इस स्लम को चमकाने का बीड़ा उठाया।

दीवारों को रंगने का काम

दीवारों को रंगने का काम

PC-User:H0tte

'असल्फा स्लम' की दीवारों को खूबसूरत बनाने के लिए 'चल रंग दे' एनजीओ की हेड देदीप्य रेड्डी ने मुंबई मेट्रो और पेंट बनाने वाली कंपनी स्नोसेम के साथ हाथ मिलाया और इस स्लम को खूबसूरत बनाने के बारे में सोचा। जिसके बाद उन्होंने स्थानीय लोगों से बात कर अपनी टीम के साथ एक वेबसाइट बनाई, जिसके बाद शुरू हुआ 'मिशन असल्फा'।

वॉलंटियर्स में सीनियर सिटीजन भी शामिल

वॉलंटियर्स में सीनियर सिटीजन भी शामिल

PC-Stepanie Costa

असल्फा की सभी दीवारों को रंगने का काम एनजीओ की अकेली टीम से नहीं होना था, जिसके लिए स्थानीय लोगों को इस काम में लगाया गया। बता दें इस योजना से सभी इतने प्रभावित हुए, कि एनजीओं की बनाई वॉलंटियर्स टीम में सीनियर सिटीजन भी शामिल होना शुरू हो गए। आपसी सहयोग के बल पर बस्ती की 175 दीवारों को रंगा गया।

400 लीटर पेंट का इस्तेमाल

400 लीटर पेंट का इस्तेमाल

PC - Trinidade

बता दें कि घाटकोपर की इस मलिन बस्ती को रंगने के लिए करीब 400 लीटर पेंट का इस्तेमाल किया गया है। इस काम को ऐतिहासिक बनाने की राह में 750 लोगों द्वारा इसे स्पॉन्सर भी किया गया। दीवारों को और खूबसूरत बनाने के लिए कई तरह की कलाकृतियां बनाई गई हैं, जो मेट्रों में सफर करने वालों के साथ-साथ विदेशी पर्यटकों का भी ध्यान खींच रही हैं। स्लम की रंगबिरंगी तस्वीरों को अपने कैमरे में उतारने के लिए यहां विदेशी सैलानियों का आना जाना लगा हुआ है।

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